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  • 6 hours ago
"न नायक-नायिका के प्रेम का अभिसार लिखती हूँ, न रीति कवियों की तरह श्रृंगार लिखती हूँ।"

इस वीडियो में कवयित्री अर्चना अपनी ओजस्वी वाणी में समाज की उन कड़वी सच्चाइयों को उजागर कर रही हैं, जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। इस कविता के माध्यम से उन्होंने भ्रष्टाचार, मासूमों की भूख, बेटियों पर होते अत्याचार और सीमा पर जवानों के बलिदान को शब्दों में पिरोया है।

कविता के मुख्य अंश:

भ्रष्टाचार और सत्ता के अहंकार पर प्रहार।

गरीब बच्चों की भूख और समाज की संवेदनहीनता।

भारतीय सेना का गौरव और मातृभूमि की वंदना।

चाटुकारिता का विरोध और सत्य के प्रति संकल्प।

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