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  • 2 hours ago
83 साल की उम्र में भी, देबेंद्र मिश्रा, जिन्हें ओडिशा का ‘विश्वकर्मा’ भी कहा जाता है, अपने हुनरमंद हाथों और कलाकारी से बेजान पत्थरों में जान डालना जारी रखे हुए हैं। उम्र के कारण उनका शरीर भले ही कमज़ोर दिखता हो, लेकिन उनकी उंगलियां आज भी स्थिर और रचनात्मक हैं। आज भी, वे पत्थरों से कलात्मक मूर्तियां बनाते हैं—एक ऐसा काम जिसे वे पिछले 50 से भी ज़्यादा सालों से करते आ रहे हैं. मिश्रा कहते हैं, “मेरा मकसद यह पक्का करना है कि ओडिशा की मूर्तिकला की समृद्ध कलात्मक परंपरा आने वाले दिनों में भी फलती-फूलती रहे और जीवंत बनी रहे.”मिश्रा के लिए, मूर्तिकला सिर्फ़ एक पेशा नहीं, बल्कि जीवन भर का समर्पण है। कला ने उन्हें न सिर्फ़ रोज़ी-रोटी दी है, बल्कि गहरी आत्म-संतुष्टि और आत्मविश्वास भी दिया है। अपने छात्रों की सफलता देखकर उन्हें बेहद गर्व और खुशी महसूस होती है।

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Transcript
00:02उम्र के 83 वे पड़ाव पर जहां अक्सर हाथ कापने लगते हैं, वहीं देवेंद्र मिश्रा के हाथ आज भी पत्थरों
00:09में सासे भर देते हैं।
00:11उन्हीं यू ही उडिशा का विश्वकर्मा नहीं कहा जाता। उनकी हर चोट, हर तराश पत्थर को जीविन्त आत्मा में बदल
00:19देती हैं।
00:20पिछले 50 सालों से भी अधिक समय से वो अपनी जिंदिगी को पत्थरों के नाम कर चुके हैं।
00:26ये सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि एक तपस्या है, एक ऐसा जुनून जिसने उन्हें समय से परे खड़ा कर दिया।
00:56देविंद्र मिश्रा ने 300 से जादा शिश्यों को इस कला में पारंगत किया।
01:00उनके शिश्य आज देश ही नहीं, बलकि विदेशों में भी उडिशा की मूर्ती कला का पर्चम लहरा रही है।
01:07मानों मिश्रा की छेनी की गूंज सीमाओं को पार कर गई हूँ।
01:14इस काम में हमें जो समस्या आती है वो बाजार को लेकर है, मुर्तियों का बाजार दूसरे राज्यों में तो
01:20है पर इसका उचित दाम नहीं मिल पाता।
01:52राज में यही समस्या है।
02:22अधर से भी जादा मजबूत है।
02:52पदमिश्री सम्मान से नवाज आ जाए।
03:17पदमिश्री समय को थामे हुए है।
03:23और पथरों में आज भी दिल धड़काना सिखा रहे है।
03:26Bureau Report, ETV भारत
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