00:02उम्र के 83 वे पड़ाव पर जहां अक्सर हाथ कापने लगते हैं, वहीं देवेंद्र मिश्रा के हाथ आज भी पत्थरों
00:09में सासे भर देते हैं।
00:11उन्हीं यू ही उडिशा का विश्वकर्मा नहीं कहा जाता। उनकी हर चोट, हर तराश पत्थर को जीविन्त आत्मा में बदल
00:19देती हैं।
00:20पिछले 50 सालों से भी अधिक समय से वो अपनी जिंदिगी को पत्थरों के नाम कर चुके हैं।
00:26ये सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि एक तपस्या है, एक ऐसा जुनून जिसने उन्हें समय से परे खड़ा कर दिया।
00:56देविंद्र मिश्रा ने 300 से जादा शिश्यों को इस कला में पारंगत किया।
01:00उनके शिश्य आज देश ही नहीं, बलकि विदेशों में भी उडिशा की मूर्ती कला का पर्चम लहरा रही है।
01:07मानों मिश्रा की छेनी की गूंज सीमाओं को पार कर गई हूँ।
01:14इस काम में हमें जो समस्या आती है वो बाजार को लेकर है, मुर्तियों का बाजार दूसरे राज्यों में तो
01:20है पर इसका उचित दाम नहीं मिल पाता।
01:52राज में यही समस्या है।
02:22अधर से भी जादा मजबूत है।
02:52पदमिश्री सम्मान से नवाज आ जाए।
03:17पदमिश्री समय को थामे हुए है।
03:23और पथरों में आज भी दिल धड़काना सिखा रहे है।
03:26Bureau Report, ETV भारत
Comments