00:00मृत चित्रकार की अधूरी पेंटिंग स्टूडियो में वैसे ही रखी थी। उसकी बेटी रूपा ने सोचा बाबा की याद में
00:08रखूंगी। पर हर सुबह पेंटिंग थोड़ी और पूरी होती थी।
00:30नदी थी और घर के सामने बाबा खड़े थे। मुस्कुराते हुए रूपा पेंटिंग के पास गई। बाबा के हाथ में
00:40एक छोटी चिट्थी थी। पेंटिंग में ही। उसने पढ़ा बेटा मैं वहाँ पहुँच गया जहा जाना था। सुन्दर है। रूपा
00:50ने पेंटि
00:53हुआई बाबा की।
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