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  • 15 minutes ago
वचन, अपमान और विनाश: द्रौपदी की आग से जली महाभारत


Description

जब सभा में दुशासन ने द्रौपदी का चीरहरण करने की कोशिश की,
तब श्रीकृष्ण ने चीर बढ़ाकर उसकी लाज बचाई।
परंतु उस दिन द्रौपदी ने प्रतिज्ञा की थी —
"जब तक दुशासन का रक्त अपने बालों में नहीं लगाऊंगी, चैन से नहीं बैठूंगी!"
देखिए, कैसे यह प्रतिज्ञा युद्ध के मैदान में पूरी हुई।

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Transcript
00:00राजसबा में दुरोपती का चीर हरन हुआ, सब मौन थे। दुरियोदन ने कहा आओ दुरोपती, मेरी गोद में बैटो। दुरोपती
00:08की आखों में आसू थी, लेकिन मन में अगनी जल चुकी थी। वो चीक पड़ी, हे गिर्सन, अब केवल तू
00:16ही मेरी रक्षा कर सकता है।
00:18और तवी इसरी किसन ने अपने दिव्य रूप से चीर बढ़ाया, चीर समापती नहीं हुआ, पर दुरोपती के बीतर परतिक्या
00:26जनम ले चुकी थी। जब तक दुरियोदन और दुषासन का आंत नहीं होगा, तब तक चैन नहीं लूँगी। वर्सों बाद
00:34युद गुम
00:47और दुरोपती ने तुषासन के खुन से अपने बाल दोए, लेकिन मा भारते ने सब कुछ बदल दिया, अपमान का
00:56जवाब समय जरूर देता है, नमस्कार
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