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  • 3 minutes ago
मेरी अन्तर्यात्रा

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00:04नमस्कार मैं डॉक्टर श्वेता तिवारी आप सभी का अभिनन्दन करती हूँ आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रिका के प्रधान
00:13संपादक विद्यावाचस्पती गुलाब कोठारी जी का परिवार में प्रकाशित आले जिसका शीर्षक है मेरी अंतर या
00:29वश्यक्ता है वैसे तो सभी पुराण इसी आधार पर सूत्रात्मक भाशा में तथा वैज्यानिक धरातल पर लिखे हुए हैं वेद
00:38उपनिशत भी आत्मा को ही केंद्र में लिये हैं पद्या में हैं गीता की भाती ही जीव की 84 लाख
00:45योनियों का यात्रा वृत्तांत प्रक
00:59अपने मोल स्वरूप का भान भी कैसे हो आज भी मैं अपने शरीर को आधार बना कर ही जीवन के
01:06कार्य कलाब संपन्न करता हूं किसीने नहीं बताया मुझे कि मैं शरीर नहीं शरीर का स्वामी हूं दिखाई नहीं देता
01:13स्वयम को भी नहीं स्वयम अपने लिए भी मैं अनु
01:29बस प्रक्रति के आदेश के अनुरूप भोग करना शेश रहता है।
02:00अतह सोम को ही प्रकाश का प्रवर्दक कहा है।
02:34इस रितागनी से ही इस्त्री का आत्मा बनता है।
02:37इस्त्री रितागनी में ही है, हर समय इसमें रितागनी उपलब्ध भी नहीं होती।
02:42रित्तु काल में ही इस रितागनी का विगास होता है।
02:46यही रित्तुमती इस्त्री सोम की आहुती ग्रहन करके प्रजा उत्वन करती है।
02:51मैं जब चंद्रमा पर पहुँचा तो उसके अंधेरे भाग में पहुँचा, जो की पित्रों का स्थान है।
02:57वहां से समया नुसार परजन्य के साथ यात्रा आरंभ हुई।
03:02परजन्य को बरसना है, यह भी प्रकृती तै करती है कि कहां बरसना है।
03:07मुझे किस भूखंड पर प्रित्वी में प्रवेश करना है, बीज रूप में।
03:12प्रित्वी अगनी है, जल सोम है।
03:14जल के माध्यम से मैं भी धस गया एक खेट में, जो मुझे लेने को तैयार किया जा चुका था।
03:21प्रित्वी की महध योनी में जाकर जल की सहायता से अंकुरित हो जाना था।
03:26प्रिश्ण के शब्द है मम योनिर महध ब्रह्मू। मैं भी ब्रह्मानशी तो हूँ।
03:30महध में ही माया से युक्त होकर मातरिश्वा वायू की सहायता से आहुत होता हूँ।
03:36अन्न ही मेरा शरीर बना, अन्न के सहारे पुरुष शरीर में वैश्वानर में आहुद होता हूँ।
03:42शरीर के धातों के साथ बढ़ता हुआ, शुक्र में समाहित हो गया, शुक्र से ही ओज और मन बनता है।
03:49पुरुष शरीर में आत्मा व्याप्त रहता है, इसी में उसके पूर्वजों के अंश व्याप्त रहते हैं
03:55मुझे पुम्रून के रूप में शुक्रानों के शुक्र में प्रतीक्षा करनी पड़ी
04:00अनुरूप बीज था, मुझे नहीं मालूम आगे का यात्रापत, बस प्रतीक्षा
04:05सोचता हूँ कि कितने प्राणी होंगे, जो इतनी बार अगनी कुंड से गुजरते होंगे
04:10कितना कठिन है मानव शरीर धारन करना
04:13वैश्वानर से बाहर आते ही डाल दिया रख्त नदी में
04:16क्या पाप किया था मैंने, मांस के परवतों में फसा रहा
04:20अस्थी मज्जा के शिला खंडों का पोशन करता हुआ, यहां शुक्र में आप होंचा
04:25बेरे चारों और लाखों शुक्रानों हैं प्रतीकशा में, किस की नहीं मालूँ
04:30हां लगता है शीर सागर का शीतल निवास है
04:33मेरे भीतर रम है, जिस शरीर में इस्थित हों कोई बड़ा ब्रंभांड है
04:38और अचानक एक दिन शरीर में तेज भूखंप के जटके लगे
04:42संपून शुक्रानों सेना में खलबली मच गई
04:45किसी बाहरी शक्ती ने मानों शरीर में प्रवेश किया, जैसे कोई दुरगा
04:50संपून शरीर से आत्मा के अंश पटोरे और लेकर मेरे पास आई
04:54बोली, चलना है लंबी यात्रा पर
04:57केवल मुझे ही बोली, इतने में तो एक आंधी में हम उड़ गए
05:01हवा के तेज दबाव से बाहर तो निकले, किन्तु वहाँ फिर एक कुंड था
05:05लगभगपूरी सेना भस्म हो गई
05:08जल बाहर की और बह निकला, मैं और वह शक्ती अपने सामान के साथ बच निकले
05:13हवा अभी चल भी रही थी, हम लंबी गुफा से निकल रहे थे
05:18यहां गुफा में ही मेरा शरीर भी छूट गया
05:21शक्ती ने मुझे नए मित्र से मिला दिया, हम एक हो गए
05:24हवा से एक बुदबुद उठा, हम दोनों एक साथ बंद हो गए
05:28केंदर में रहने लगे, वह तो शिदय था बुदबुद का
05:31वही पुरुष के आकरती अंश, जीवात्मा, मैं, तथा ब्रम्भांश, सभी एकत्र हो गए
05:38हम सब मिलकर एक हो गए, साथ साथ रहने लगे
05:41मैं जहां से आया, वहां से भिन स्थिती में था
05:44खाने पीने की विवस्था भिन थी, मैं चटपटा रहा था
05:48बाहर निकलने को कोई संभावना नहीं थी
05:50कहते हैं, संसार में बार बार आवर्त मान महानात्मा ही है
05:55यही सत्व लक्षन परात पर है, यही जल है किन्तु इंद्रियों से दिखता नहीं है
06:00रस, रूप, गंध, आधी नहीं है, शित्रग्य में पहुचकर निरात्म हो जाता है
06:07महानात्मा तीन प्रकार का होता है, सत्व, रज, तम, रूप में
06:11सत्व विशुद्ध होता है, उसके चारों और रज और तम होते हैं
06:16वह जब विभूतियां करने लगता है, तब ये दोनों संबंध, उसे शित्रग्य से अलग कर देते हैं
06:22माया से घिरा हुआ जीव, मिथ्या दर्शन के कारण, मैं स्रिष्टा हूँ, मैं द्रिष्टा हूँ, मैं ही विभकता हूँ, ऐसा
06:29समझने लगता है
06:31महाभूत आकाश से वायू, तथा वायू से प्राणों का प्रकाश है
06:34तेज से आक, जलों से सने, तथा पृत्वी से मूर्ती बन जाती है
06:40पुरुष में पृत्वी के आठ गुन रहते हैं, तीन मा से तथा तीन पिता से
06:44मा से हड़ी, सनायू, मज्जा प्राप्त होते हैं, तथा पिता से तवचा, मांस और रुधिर मिलते हैं
06:50मा से ही खाना और पीना भी चलता है
06:54शुती कहती है, तू ही इस्त्री है, तू ही पुरुष
06:57इस्त्रियह सतिस्ताम, उमे, पुन्स, आहु, रिग्वेद
07:02इस्त्रित्व और पुरुषत्व, बस्तुता है नहीं, वह जैसे जैसे शरीर को पाता है, वैसे वैसे नाम से पुकारा जाता है
07:10निरुप्त आगे कहता है, पुरुष जो जो अनुरोध करता है, कार्य करता है, वैसा ही हो जाता है
07:16यदि धर्म का अनुरोध करता है, तब देवर्त वपा जाता है, यदि ज्यान का अनुरोध करता है, तो अमर बन
07:23जाता है, काम के अनुरोध से गिर जाता है, वैसी ही योनी प्राप्त करता है, निरुक्त मेरी यात्रा का वर्णन
07:30भी करता है, शुक्र रज की मात्रा से मुझे �
07:34Na prax.
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08:52प्रिदय के 8 भाग हैं जीव के बाहर अंड़कोष 8 पक्षो वाले हैं मूद्त्रेंद्रिय शौचेंद्रिय खाने पीने से सिक्त होते
09:02हैं विद्या और कर्म साथ जाते हैं अज्यान अंदकार की कारण भूख, प्यास, क्रोध, लोब, मोह, भय, आदिर वंद्वों से
09:10तिरस्क
09:18तैजस देह प्राप्त कर लेता है कर्म फल भूब कर फिर इसी लोक में पहच जाता है
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