00:00राद के 1.47, रोहन, 28 साल का एक यूवक, ओफिस से लोटते हुए लोकल ट्रेन के आखरी डिब्बे में
00:08चड़ गया, पूरा डिब्बा लगभग खाली था, सिर्फ एक कोने में एक औरत बैठी, ट्रेन चल पड़ी, पंखा चल रहा
00:17था, फिर भी हवा भारी थी, उसने मुबा
00:29रोहन ने हिम्मत करके पूछा, आप ठीक है, औरत ने धीरे धीरे सर उठाया, उसका चेहरा नहीं था, सिर्फ खालीपन,
00:39रोहन पीछे हट गया, उसी समय टीटी आया, टीटी ने कहा, अरे तुम यहां क्यो बैठे हो, रोहन ने कापती
00:48आवाज में कहा, वो, वो औरत टीटी
00:53ने बीच में ही रोक दिया, बेटा, इस डिब्बे में कोई औरत नहीं बैठती, तीन साल पहले, एक 28 साल
01:01की लड़की ने जान दी थी, ट्रेन अचानक रुख गई, लाइट चली गई, अंधेरे में एक फुस-फुसाहट गूंजी, अब
01:09तुम्हारी बारी, सुबह स्टेश
01:11पर रोहन का बैग मिला, डिब्बा नंबर आखरी
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