00:00आधी रात को मैं लोकल ट्रेन से उत्रा, प्लेटफॉर्म पर कोई नहीं, बस एक ठंडी हवा और हलकी सी सीटी
00:08की आवाज, जब मैं निकास की तरफ बढ़ा, मैंने देखा, प्लेटफॉर्म नौ का बोर्ड, हमेशा से एक से नौ ही
00:16थे, ये कब बना? जिग्यासा में मैं वहा
00:19चला गया, रास्ता अंधेरा, पुराना और सीलन भरा, अचानक एक बूढ़ी औरत दिखाई दी, उम्र करीब सत्तर, वो बोली, गलत
00:30जगे आ गए हो बेटा, यहां से वापस कोई नहीं लोटता, मैंने पीछे मुड कर देखा, मेरी ट्रेन फिर से
00:38उसी प्लेटफॉर्म पर
00:39खड़ी थी, पर पूरी खाली, फिर वही औरत मेरे पास आकर बोली, जिसे तुमने छोड़ा है, वो कई साल पहले
00:47मर चुका है, मैं दंग रह गया, मेरी जेब में वही टिकट था, तारीक पांच साल पुरानी,
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