00:00अम्मी आज मस्जिद में देखा कि काफी लोग तरावे में कुरान हाथ में पकर खरे थे, क्या ये ठीक है?
00:04बेटा बहुत अच्छा सवाल है, देखो नफल नमाज में मुश्फ से देख पढ़ने की इजाज़न सलफ सालिहीन से मिलती है,
00:10लेकिन सिर्फ मजबूरी की चंद सूरतों में, आम रुटीन के तौर पर नहीं।
00:34बेटा दूसरी सूरत ये है, अगर पीचे खरा होने वाला शख्स कुरान याद न रखता हो, मगर इमाम की गलती
00:39दुरूस करवाने के लिए मुश्फ पकर ले, ताके लुकमा दे सके, जैसे अनासिब माले के गुलाम उनके पीचे खरे होते
00:45थे, और तीसरी सूरत ये है, अ�
01:03नमाज की कई सुनते मुश्फ पर नजर जमी रहती है, इसी तरह कयाम में नजर चुका कर रखना मसनून है,
01:17जबके मुश्फ पर नजर जमी रहती है, बिला जरूरात हरकत माना है और सफ़े पलतना मुसलसल हरकत है, इससे खुशु
01:23मतासिर होता है, कुरान को दिल से सुनना म
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