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Transcript
00:00एक ही है जो मालिक कहने के योग्य है द्रापदी ने भी उसको सबसे अंतमे याद किया कृष्ण बचाओ द्रापदी
00:10के मन में भी यदि सदा कृष्ण का वास होता तो वो ये नौबत ही नहीं आने देती कि शकुनिका
00:15प्रस्ताव स्विकार किया जाए द्यूत के लिए सब बै
00:20मनोरंजन के लिए ना मन में यदि कृष्ण बैठे होते तो फिर मनोरंजन की जरूदत क्या थी तो भाईयों को
00:27तो कृष्ण आखीर तक याद नहीं आए तो भाई गुलाम ही बन गए स्वामी थे दास बन गए ये तो
00:32भला हुआ कि दिरापदी को जब बिलकुन लुटने का
00:35अख्षण आ गया तब खृष्ण याद आ गये आपको कभी याद आएंगे जल्दी याद आएंगे कैसे मन में तो संसारी
00:44पति भरे हुए है पति कौन इसके भरोसे जिंदगी काटी जा सकती है वोई पति हुआ अगर पैसे के भरोसे
00:52जीते हो तो पैसा क्या हो गया पति त�
01:05अंसार के तुम जितने भी पति बनाते हो वो इन पांचों इंद्रियों से ही सम्मंधित होते हैं तो यह जितने
01:12भी तुम इंद्रिय गत पति बनाओगे यह सब सिर्फ आरे समय में विफल साबित होंगे धोखा दे जाएंगे दूसरी ओर
01:20है मीरा जाके सिर मोर मुकुट मेरो प
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