00:00पर नंदू खरगोश होता था, तो उसके पाओं में चोट थी, बलकि जन्म से ही उसके पाओं में एक विक्रती
00:07थी, तो उसके पंजे पर बाल नहीं थे, जब बाल नहीं थे, इनका मास बड़ा मुलायम होता है, तो जब
00:12बाल नहीं थे, तो उसको चलने में तकलीफ होती थी, �
00:15तो वो उचल नहीं सकती थी, बागी खरगोशों भीतर है, जमीन पर चल लेती थी थोड़ा बहुत, लेकिन वो उचल
00:21और नहीं सकती थी, और थोड़ा जादा चले तो खोन आ जाए उसके, तो उसके पंजे पर पट्टी करके रखना
00:26होता था, तो उसको मैं अपने ही साथ रख
00:45होता था, मेरा हाथ ऐसे रखा है, तो मेरा हाथ चाट में शुरू गड़ देता था, जैसे उसको सब समझ
00:51में आता हो, जानता हो कि इसकी देख भाल की जा रही है, प्रेमी हो जैसे इसको, फिर उसको जीना
00:59तो था यह नहीं बहुत दिन, क्योंकि खरगोशों का पाचन तंतर
01:03बड़ा नाजुक होता है, तो अतना जब वो एक्टिविटी नहीं कर पाता था, तो उसके पच्छने में समझ से आने
01:10लगी, और कुछ मेरा दोश उस वक्त में बहुत जादा जानता नहीं था, तो इनसानों के खाने पीने की चीज़ें,
01:17एक दिन मैंने देती उसको, एक दि
01:31गेट में गैस्ट्रो कुछ बोलते हैं, खरगोशों का, वो हो गया, और मेरे ही हाथ में उसने दम तोड़ा, उतना
01:40गहरा रिष्टा किसी पशो से मेरा पहले कभी नहीं बना था, और यह मैं बिलकुल साफ अनुभव कर पाया कि
01:47उस रिष्टे ने और उस घटना ने मुझे �
01:50बदल सा ही दिया भीतर से बलकुल, और रोया बहुत, फिर उसको ले गया उसको दफनाने और रखे लिए, एक
01:58कहीं पे मैंने बूला भी है ना कि जब तक किसी जानवर से आप दोस्ती नहीं करते तब तक आप
02:03इनसान भी पूरे नहीं बन पाऊगे, तो मुझे तो लगता है
02:06मुझे उसी दोस्ती ने थोड़ा सा इनसान बना दिया
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