00:00यूट्यूब वीडियो पर वो पेला मॉनिटाइजेशन आइकॉन, उससे परिशान तो काफी क्रियेटर्स होते हैं, है न? अगर हाँ, तो ये
00:07बातचीत बिल्कुल सही जगा पर हो रही है. आज हम यूट्यूब के सेल्फ सेटिफेकेशन सिस्टम को समझने वाले हैं, ताकि
00:13म
00:26महनत पर कहीं पानी न फिर जाए. पर असल में इसका मतलब क्या है? चलिए आज इसे पूरी तरह से
00:32समझते हैं. तो असल प्राब्लम क्या है? प्राब्लम है कंट्रोल की. एक क्रियेटर वीडियो बनाता है, महनत करता है, और
00:40फिर एक आटोमेटिज सिस्टम के फैसले का इंत
00:56सच में काफी डी मोटिवेटिंग हो सकता है. लेकिन एक मिनिट, क्या हो अगर इस फैसले में क्रियेटर खुद शामिल
01:02हो सके? अगर कंट्रोल वापस क्रियेटर के हाथ में आ जाए? यहीं पर यूट्यूब एक बहुत ही दिल्चस्प सल्यूशन लेकर
01:09आता है. जी हाँ, हम
01:10बात कर रहे हैं सेल्फ सर्टिफिकेशन की. अब यह सुनने में शायद थोड़ा टेकनिकल लगे, पर यह कोई बोज नहीं
01:17है, बलकि यह एक सूपर पावर की तरह है, जो क्रियेटर को अपने कंटेंट की कमान वापस देता है. मतलब
01:23बिल्कुल सिंपल है, क्रियेटर खुद
01:25यूट्यूब को बताता है कि उसके वीडियो में क्या है, इससे यूट्यूब को फैसला लेने में आसानी होती है, और
01:30सबकुछ तेजी से होता है. यहाँ पर क्रियेटर का इंपुट ही सबसे जरूरी है, सिस्टम को एक तरह से गाइड
01:36किया जा रहा है. और यह देखिए, फ
01:55तो सवाल यह है कि किन वीडियो को रेट करना जरूरी है? तो सुनिए, हर नए वीडियो पर जिसमें आड्स
02:01आन किये जा रहे हैं, और उन पुराने वीडियो पर भी जिनके आड्स पहले बंद थे, लेकिन अब आन किये
02:08जा रहे हैं. ठीक है, ठियारी तो हो गई. चलिए, अ
02:23अड़र्टाइजर्स को दिक्कत हो. तो हुआ क्या? क्रियेटर ने रेट किया कि हाँ भाई, वीडियो बिलकुल अराम से अड्स के
02:29लिए सूटबल है. यूट्यूब के सिस्टम ने चेक किया और अग्री किया, और रिजल्ट बूम, ग्रीन आइकॉन, फुल मॉनिटाइजे
02:51है. तो क्रियेटर ने इमानदारी से बताया कि लिए ठीक है. और यूट्यूब का सिस्टम भी इस बात से सहमत
02:57हुआ. नतीजा? हाँ, पीला आइकॉन आया, लिमिटेड अड्स लगे, पर यहाँ एक बहुत इंपॉर्टन चीज़ हुई. क्रियेटर की रेटिंग और
03:18सिस्ट
03:21होता है. यहाँ पर मामला बिगड़ गया. क्रियेटर ने कहा, सब ठीक है. लेकिन जब एक human reviewer ने देखा,
03:28तो पता चला कि content sensitive है. इससे क्या हुआ? एक तो ads limit हो गए, और उससे भी बड़ी
03:35बात, क्रियेटर का trust score कम हो गया. यह सिर्फ एक वीडियो की बात नहीं है. इसका अ
03:51यहाँ YouTube ट्रैक करता है कि एक creator की rating कितनी बार उनकी अपनी rating से match करती है. यह
03:57एक दो वीडियो का खेल नहीं है. यह platform के साथ एक लंबा भरोसे का रिष्टा बनाने जैसा है. और
04:02जिनका trust score अच्छा होता है न, उन्हें अकसर नए monetization features का early access मिलने जैसी चीज़े भी हो
04:08सकती है.
04:09यह चार्ट तो पूरी कहानी बता रहा है. जिनकी accuracy high है, उनका trust high है और approvers भी फटाक
04:16से मिलते हैं. दूसरी तरफ, जिनकी accuracy कम है, उनके वीडियोस पर ज्यादा AI checks लगते हैं और बेमतलब की
04:23देरी होती है. तो choice बिलकुल clear है, है न? और यह मामला सिर्फ पीले icon तक सीमित नह
04:39है, तो इसे हलके में बिलकुल नहीं लेना है. ठीक है, तो अब जब हमने problem और इसके नतीजे समझ
04:44लिये हैं, चलिए अब solution पर focus करते हैं, ऐसी रणनीतियां जिनको creators फोरण इस्तमाल कर सकते हैं. यह है
04:52एक pro tip, एकदम professional creators वाला तरीका. वीडियो को सिधा public मत करो, पहले उसे private
04:58या unlisted करके upload करो, फिर monetization on करके self-certify कर दो, थोड़ा इंतिजार करो, system को अपना काम
05:05करने दो, जब icon green हो जाए, उसके बाद आराम से वीडियो को public करो, कोई last minute surprise नहीं.
05:12तो इस पूरी चर्चा का निचोड क्या है?
05:14चार, simple rules. पहला, इमानदारी से rate करना है, उम्मीदों के हिसाब से नहीं. दूसरा, सटीक rating से platform का
05:23trust बनता है. तीसरा, trust से monetization तेजी से होता है. और चौथा, हमेशा advertiser friendly guidelines को एक बार
05:30जरूर चेक कर लेना है. बस यही है सफलता का मंत्र. और आखिर में एक सवाल. क्या इमानदा
05:37चारी ही आखिर में सबसे बड़ा monetization hack है. शायद ये self certification सिर्फ एक rule follow करना नहीं है.
05:45शायद ये एक strategic advantage है. सोचने वाली बात है कि शायद सबसे smart तरीका, सबसे इमानदार तरीका ही होता
05:52है.
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