बांग्लादेश ने मंगलवार को बदलाव का सूरज देखा. तारिक रहमान ने देश की बागडोर संभाली.2024 के छात्र आंदोलन और शेख हसीना सरकार के तख्ता पलट, लगभग दो साल की अंतरिम सरकार के बाद बांग्लादेश में एक लोकतांत्रिक सरकार के प्रधानमंत्री को रुप में शपथ ली. तारिक रहमान की पार्टी बीएनपी ने बाग्लादेश के आम चुनाव में 297 में से 209 सीट के साथ बड़ी जीत हासिल की हैं. 60 साल के तारिक रहमान बांग्लादेश की राजनीति में नया चेहरा नहीं हैं. उनका जन्म 20 नवंबर, 1965 को बांग्लादेश के सबसे ताकतवर राजनीतिक परिवारों में से एक में हुआ था. उनके पिता जियाउर रहमान देश के राष्ट्रपति और बीएनपी के संस्थापक थे. वहीं उनकी मां खालिदा जिया बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं. लेकिन तारिक रहमान के लिए प्रधानमंत्री की कुर्सी तक का सफर तमाम उतार-चढ़ाव से भरा रहा है. बीएनपी में अपनी जगह बनाने के बाद उन्होंने लगभग 17 साल लंदन में निर्वासन में बिताए. ये वक्त कानूनी लड़ाइयों, राजनीतिक उथल-पुथल और शेख हसीना की अवामी लीग के साथ राजनीतिक प्रतिद्वंदिता से भरा रहा. वे 2026 के ऐतिहासिक चुनाव से ठीक पहले दिसंबर 2025 में ढाका लौटे. छात्र विद्रोह और शेख हसीना सरकार के तख्तापलट के बाद ये पहला चुनाव था.वतन वापसी पर लोगों ने उन्हें सिर-आंखों पर बैठा लिया. चुनाव प्रचार के दौरान तारिक रहमान ने खुद को एक ऐसे राजनेता के तौर पर पेश किया. जिसका फोकस देश में आर्थिक बदलाव और संस्थागत सुधार लाने पर था. उन्होंने लोगों से साफ सुथरी जावबदेह सरकार का वादा किया. जिसका मकसद लोगों तक ये संदेश पहुंचाना था कि वे देश को उस गहरे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से दूर ले जाना है.जो हाल के दिनों में देखा गया. सत्ता की बागडोर संभालने के साथ रहमान के सामने चुनौतिया कम नहीं हैं. छात्र विद्रोह के बाद युवाओं की सरकार से बड़ी उम्मीदें. अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, भारत के साथ-साथ पाकिस्तान और चीन के साथ संबंध को साधना. उनके कंधों पर अगर एक बड़ी राजनीतिक विरासत का बोझ है. तो एक ऐसे देश की उम्मीदें भी हैं जो अपनी दिशा तलाश रहा है.
Comments