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Bhagavad Gita Chapter 2-भगवद गीता अध्याय 2 PART 3
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00:00एक महत्वपूण सिध्धान्त सिखाते हैं निश्काम कर्म यानी कर्म करना परंतु फल की आसकती न रखना यह जीवन के लिए एक अमूले मार्ग गर्शन है जो हमें शांत और स्थिर रहने में मदद करता है
00:14संस्कृत श्लोक
00:17कर्मने वाधिकारस्ते मा फलेशु कदाचन
00:20मा कर्मफल है तुर भूर मा ते संगोस्त्व कर्मनी
00:24अनुवाद
00:26तुम्हारा कर्म करने में ही अधिकार है उसके फलों में कभी नहीं
00:31अद तुम कर्मफल के हेतु मत बनो और तुम्हारी कर्म न करने में भी आसकती न हो
00:37व्याख्या, प्रिश्न अर्जुन से कहते हैं कि तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, परिणाम पर नहीं
00:45यह सिध्धान्त हमें चिंता और अस्पलता के दर से मुक्त करता है और हमें अपने कर्तव्य पर ध्यान केंद्रित करने की प्रेणा देता है
00:55जब हम फल की अपेक्षा छोड़कर केवल अपने कर्तव्य पर ध्यान देते हैं तो मन शान्त रहता है और हम सच्ची सफलता की ओर बढ़ते हैं
01:07चैप्टर एक्वनिमिटी दपाथ टू इनर पीस
01:10प्रिश्न समत्व या समता की महत्ता बताते हैं सुख दुख सफलता असपलता में संतुलित रहने की शक्ती
01:18जह मानसिक संतुलन सच्ची आंतरिक शांती के लिए अत्यंत आवश्चत है
01:23संस्कृत श्लोग
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