00:00क्या आपने कभी सोचा है क्यों आज के इंसान के पास सब कुछ होते हुए भी वो भीतर से खाली, बेचैन और असंतुष्ट है
00:23क्या कारण है कि पहले के युगों में साधना, शांती और सत्यकाराज था
00:29लेकिन आज जूट, लोग और हिंसा का सामराज्य दिखता है
00:33क्या सच में मानव चेतना धीरे-धीरे गिरी है
00:38आज हम एक ऐसी यात्रा करेंगे
00:41जो हमें सत्ययुग से लेकर कलियुग तक ले जाएगी
00:46जहां हम समझेंगे कि आफिर मानव चेतना का पतन कैसे और क्यों हुआ
00:51सत्ययुग वो समय जब धर्म अपने चारों पैरों पर खड़ा था
00:57संस्कृत द्रंथों में कहा गया है
01:00सत्ययुग में मानव जीवन का उद्देश्य भोग नहीं बलकी ब्रहम ध्यान था
01:16लोग ध्यान योग और भक्ती के माध्यम से ब्रहमा से जुड़ते थे
01:21शरीर सुक्ष्म था, मन निर्मल था और कर्म केवल सेवा का माध्यम
01:27तब के मनुष्य प्रकृती से एकाकार थे
01:30उनकी उर्जा शुद्ध थी, जैसे जला हुआ दीपक बिना धुए के जलता है
01:36न कोई लोग, न प्रतिस्पर्धा, न इर्षय
01:41हर आत्मा अपने स्रोथ से जुड़ी हुई थी
01:44गोश्रोथ था परमचेतना, अर्थाथ श्रीहरी विश्नु का अस्तित्व
01:50फिर समय बदला
01:52कृष्ण का कहा हुआ शाश्वत सिध्धान्त, यदा यदा ही धर्मस्य द्लानिर्भवती प्रकट होने लगा
01:59त्रेटा युग में अहंकार का पहला बीज अंकुरित हुआ
02:03मनुष्य ने पहली बार सोचा
02:06मैं ही करता हूँ, मैं ही जानता हूँ
02:09युग की लए बदली और धर्म के चार स्तंभों में से एक धै गया
02:14अब तीन ही बचे सत्यक तप शौच
02:18राजाओं ने शक्ती प्राप्त की
02:21धर्म युढ़ों का कारण बना और सत्ता का मोह बढ़ा
02:25इस युग में भगवान राम का अवतार हुआ
02:29जो दिखाने आये की मर्यादा और धर्म पालन कैसे किया जाता है
02:34भले ही संसार कितना भी दूशत क्यों न हो जाए
02:38राम राज्य सत्ययुग के अवशेशों जैसा था
02:42लेकिन समाज में अहंकार और भेदभाव की हलकी छाया फैल चुकी थी
02:48यही चेतना का पहला जुकाव था
02:51जब आत्मा ने इश्वर से दूरी महसूस करनी शुरू की
02:56फिर आया द्वापर युग
02:58जहां मानव मन का द्वंद्व अपने चरम पर पहुँच गया
03:03द्वापर शब्ध ही दो से आया है
03:06यह युग था विरोधा भास का सत्य और असत्य के मिश्रण का
03:11मनुष्य का ध्यान अब भीतर से हटकर बाहर की दुनिया पर केंडरित हो गया
03:16ज्यान था पर भक्ती कम थी
03:19बल था पर विवेक घट गया था
03:23यही वह काल था जब महाभारक जैसा महायुद हुआ
03:27क्रिश्न स्वय अव्तरित हुए
03:30क्योंकि मानव चेतना अंधकार की ककार पर थी
03:34क्रिश्न ने गीता में समझाया
03:37कर्मने वाधिकारस्ते मा फलेशु कदाचन
03:40उन्होंने याद दिलाया कि मनुष्य का असली कार्य है
03:44कर्तव्य करते हुए इश्वर में स्थिर रहना
03:48परंतो अधिकतर लोग उस गूर ज्यान को समझ न सके
03:53और धीरे धीरे मानवता ने अपनी दिव्यता खोदी
03:57अब आत्मा को भोग की चाह लगने लगी
04:00इच्छाय बढ़ी मोह गहराया और चेतना नीचे गिरी
04:05और अन्तह हम पहुँचे वर्तमान युग में कली युग में
04:11यह वह समय है जब धर्म अपने केवल एक पैर पर खड़ा है सके
04:16बाकी तीन दया तप शौच लगभग विलुप्थ हो चुके हैं
04:22क्रिश्न ने स्वय भविश्यवानी की थी
04:25कलो दश्विधन धर्म नश्टन पश्चनती सुक्ष्मदर्शिन
04:29अर्थात कली युग में धर्म के दस रूप नश्ट हो जाएंगे
04:34मनुष्य की चेतना अब बाहरी संसार में इतनी उलच तुकी है
04:39कि वह अपने अंदर के इश्वर को भूल गया है
04:42हर कोई धन, प्रसिधी और सुख के पीछे भाग रहा है
04:47पर भीतर से हर आत्मा शून्य महसूस करती है
04:52आज विध्यान बढ़ा, तक्नीक बढ़ी
04:55पर मनुष्य की आध्धात्मिक बुद्धी घट गई
04:59यह वही चेतना का पतन है
05:02जो सत्ययुक के इश्वर सम्मिलन से शुरू होकर
05:06क्लियुक की अहंकार और अज्यान की गहराई में डूग गई है
05:10धर्म शास्त्र कहते हैं
05:14यदा यदा ही धर्मस्य व्लानिर्भवती
05:16जिस तरह हर पतन के बाद उदे होता है
05:20उसी तरह चेतना का भी पुनरजन्म निश्चित है
05:24कलियुक में भी एक अमरित तक्व शेश है
05:28नामस्मरण और भक्ती
05:30भक्तिमार भी वह पूर्जा है
05:33जो गिरी हुई चेतना को फिर से उपर उठा सकती है
05:37भगवान चैतन्य महा प्रभु ने कहा था
05:41हरे क्रिश्न हरे क्रिश्न क्रिश्न क्रिश्न हरे हरे हरे
05:45राम हरे राम राम राम हरे हरे
05:47यह महामंत्र केवल एक प्रार्थना नहीं, बलकि एक कमपन, वाइब्रेशन है, जो हमारी चेतना को फिर से दिव्यता की ओर ले जाता है
05:58जब मनुष्य नामस्मरण करता है, तो वह उस उर्जास्तर पर पहुँचता है, जहां अह समाप्त होता है, और केवल प्रेम शेश रह जाता है
06:10आज Quantum Physics कहती है, Consciousness Creates Reality, यह वही बात है जो उपनिश्दों ने हजारों वर्ष पहले कही थी, यथा दृष्टी तथा स्रिष्टी, हम जो देखते हैं, वही रचते हैं
06:28जब हमारी चेतना शुद्ध होती है, तो संसार भी दिव्य दिखाई देता है, और जब चेतना दूशित होती है, तो सब कुछ अंधकार में लगता है
06:42इसलिए युग का परिवर्तन केवल बाहरी नहीं है, यह हमारे अंदर से शुरू होता है
06:51अगर हर व्यक्ति अपने भीतर प्रकाश जलाए, तो कलियुग भी स्वर्णयुग बन सकता है
06:58क्रिश्न केवल एक देवता नहीं, वे चेतना के उच्चतम स्तर का प्रतीक है
07:05क्रिश्न का अर्थ ही है, आकर्शन का स्रोथ
07:10उनकी भक्ति से आत्मा उसी चेतना से जुर्ती है, जहां सब कुछ एकाकार हो जाता है
07:16जब हम क्रिश्न चेतना में जीते हैं, तो हमारे भीतर सत्ययुग की जलत फिर से प्रकट होती है
07:24भले हम कलियुग में हूँ, लेकिन भीतर सत्ययुग जैसी शांती, प्रेम और प्रकाश को जगा सकते हैं
07:34यही कारण है कि भगवत गीता आज भी प्रासंगिक है
07:38क्योंकि यह केवल युगों की कहानी नहीं, बलकि मानव चेतना की यात्रा है
07:45तो दोस्त अगर हम देखें, सत्ययुग से कलियुग तक की यह यात्रा कोई भौतिक परिवर्दन नहीं है
07:54यह चेतना की तरंगों का उतार चड़ाव है
07:58जब आत्मा इश्वर से जुड़ी होती है, वह सत्ययुग में जीती है
08:04जब अहां हावी होता है, वह कलियुग में गिर जाती है
08:10परन्तु इश्वर ने हर युग में भक्ति का द्वार खुला रखा है
08:15जो कोई भी सच्चे मन से नामस्मरण करे
08:20वह फिर से उस दिव्य प्रकाश को पा सकता है जो कभी खो गया था
08:25याद रखिये, युग चाहे कोई भी हो, लेकिन चेतना आपके भीतर का युग तै करती है
08:33अगर आप अपने भीतर सत्य, प्रेम और इश्वर को जगा लें
08:38तो कलियुग में भी सत्ययुग लोट सकता है
Comments