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00:00जब शिव की हथेली पर वो जल रही थी, तब भी वो हस रही थी, काशी में उस रात आकाश खून की तरह लाल हो गया था, धर्ती कांप रही थी, सूर्य चंद्रभय से छिप गये थे और बीच में नाच रही थी भूतेश्वरी, अन्न पूर्णा का वह गुप्त उग्र रू
00:30शिव ने पहला प्रयास किया, माया जाल, भूतेश्वरी हंसी और माया रेत की तरह तूट कर गिर गई, दूसरा प्रयास, पाशुपत ज्योती, वह ज्योती जो ब्रह्मांड की सबसे प्राचीन दिव्य शक्ती है, लेकिन देवी ने उस प्रकाश को अपने चारों ओर घु
01:00उर्जा को शांत करती है, लेकिन भूतेश्वरी उस ध्वनी को भी चीर कर नाचती रही, तब शिव शांत हुए, उनकी त्रिशूल वाली तीसरी आँख हलके से खुली और उन्होंने उच्चारित किया, गुप्त अद्वैत मंत्र, वह मंत्र जिसे कोई देव न ब्रह्मा �
01:30हथेली चल रही थी, लेकिन वह ज्वाला अब भी हस रही थी, मैं तो तुम्हारी हूँ, फिर मुझे मिटा क्यों रहे हो, पुरान कहते हैं शिव ने उस पल में एक युग जितनी शक्ती खर्च की, और उसी दिन भूतेश्वरी का नाम इतिहास से मिट गया, अब आप बता
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