00:00अगले दिन समंदर बहुत पुर्सकों नहीं दोब जाओंगी
00:30हवा ने आहिस्ता आहिस्ता चलना शुरू किया
00:32बढ़बान ने अपने कपरोन जैसे सफेद बाजू फिलाए
00:35और हवा ने उसे हुले से आगे धकेल दिया
00:38पांच कदम, दस कदम, फिर आहिस्ता आहिस्ता कश्टी पनी पर तैरती हुई दूर जाने लगी
00:43बढ़बान खुशी से बोली
00:44हवा, मुझे दर नहीं लग रहा हवा ने कहा
00:47देखा, कभी-कभी दर सिर्फ हमारे दिल का वेम होता हा
00:51बढ़बान उस दिन पहली बार समंदर के वुस्ट तक गई
00:54निलाई पनी की चमक, दूर तक फेली लहरेन और लंबे आस्मन ने उसका दिल खुशी से भर दिया
01:00उसके बढ़बान न दर्ती न रुकती
01:02वो हवा की बहतरीन दोस्ट बन गई और दोनों मिलकर समंदर की सेर करती रही
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