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  • 1 year ago
यह कहानी उस प्रेम की है जो शब्दों से परे है, जो दूरी में भी निकट है।
एक ऐसा सम्प्रेषण जो कभी बंद नहीं होता—बस रूप बदलता है।
अगर तुम चाहो, तो हम इसे उस मोड़ तक ले जा सकते हैं जहाँ यह सम्प्रेषण जीवन की सबसे सच्ची कविता बन जाता है।
Transcript
00:00She was a mother, a doctor, and a son of a son of a son.
00:07I, a son of two children's father, was a son of Boston in my own home.
00:17Our circumstances were on the internet, and a habit was on the way.
00:24Every day, we were together.
00:27दिल्ली की सुभा और बॉस्टन की शाम।
00:57हम दोनों ही दिल से सोचते थे, दिमाग से कम।
01:03वो शास्तरिय संगीत में रची बसी थी, मैं वॉयलिन बजाता था।
01:09हम दोनों को कला में पहचान नहीं मिली, लेकिन कला ने हमें पहचान दी।
01:16ॐ ॐ ॐ
01:46और सुभा की पहली किरन के साथ पढ़े जाते थे
01:50इंटरनेट ने उन्हें एक ऐसा रिष्टा दिया जो किसी समाजिक ढाजे में फिट नहीं बैठता था
01:58लेकिन दिल की भाशा में पिल्कुल सटीत था
02:03इस इंटरनेट ने हमें एक बहुत कीमती अनाम रिष्टा दिया है उसने कहा था
02:10और उतकर्ष ने जवाब दिया
02:13इसे खोने मत देना कविता इसी के जरिये हम एक दूसरे में खुद को खोचते रहते हैं
02:21वे कभी-कभी बहस करते, नाराज होते, लेकिन जल्दी ही एक दूसरे को मना लेते
02:28उनके बीच की इमानदारी इतनी गहरी थी कि एक दिन कविता ने बहुत आग्रह के बाद अपनी तस्वीर भेजी
02:37हल्दी रंग की साड़ी, लाल बॉडर, लंबी चोटी और केन के जूले पर बैठी एक इस्त्री जो भारतियता की सौमिता में रची बसी थी
02:49उस तस्वीर को देखकर उतकरश की उंगलियां रुप नहीं पाई
02:55कवी, तुम बहुत खूपसूरत और आकरशक हो, जबकि मैं तो पैंतालेस साला का एक रौड हूँ
03:03कविता ने मुस्कुराते हुए लिखा
03:07उतकरश, दोस्ती में उम्र के क्या माइने? किसी भी चीज के क्या माइने? दोस्ती, दोस्ती है
03:16उस सुभा, जब खिडकी से भारी परदा हटाया गया, तो बाहर बसंत की आहट थी
03:23पेड नए लाल-लाल पत्तों से भर गय थे
03:26सुभा के पाँच पजे थे
03:29और उस लालिमा में उतकरश को कविता की परच्छाई दिखाई दी
03:33एक ऐसी छवी जो अब सिर्फ तस्वीर नहीं थी
03:37बलकि एक एहसास बन चुकी थी
03:40और तभी उसने टाइप कर दिया
03:42और दोस्ती, यदि आगे निकल कर आकरशन
03:46या ऐसा ही कुछ अलग रिष्टा बन जाए तो
03:49ये कहानी उस मोड पर आखड़ी हुई थी
03:54जहां भावनाए अपनी परिभाशा खोजने लगी थी
03:57उस एक शण में जब संबाद ने भावनाओं की सीमाए पार कर ली
04:02जहां शब्दों ने सिर्फ दिल को नहीं छुआ
04:05बलकि आत्मा को भी जगा दिया
04:07और एक ऐसा प्रेन की रोशनी में नहीं
04:10भावनाओं की गहराई में जला
04:12उतकर्ष कवी
04:15दो दिन तक वो इंटरनेट पर नहीं आई
04:18उतकर्ष बेचैन था
04:20क्या उसने कुछ ऐसा कह दिया
04:22जो कविता की भावनाओं को ठेस मौचा गया
04:24वो जानता था कि ये रिष्टा एक भरोसे की नीव पर खला है
04:29साफ सुतरा, निश्चल
04:31लिकिन तीसरे दिन वो लौटी
04:33कुछ लिखो
04:34उसने कहा
04:36मैं बहुत परिशान रहा
04:39उतकर्ष ने टाइप किया
04:41मैं भी
04:42कविता ने जवाब दिया
04:44तुम क्यों?
04:45आपसे चैट के बाद एक वाइरस आ गया था
04:47तुम्हारे कंप्यूटर में?
04:50नहीं, मन में
04:52वो एक मुस्कान थी
04:54जो स्क्रीन से जागती थी
04:55तुम्हारी आकर्शन वाली बात
04:58बहुत कंटीजिस थी
04:59मतलब?
05:01मतलब वो रोग, मुझे भी लग गया
05:03और यहीं से प्रेम ने
05:06आग पकड़ ली
05:06कविता के पती जापान गए थे
05:09मेडिकल सेमिनार में
05:11और इन कुछ दिनों में
05:12वो आग धदक कर जली
05:14तनमन के सारे विकार जल गए
05:16और जो बचा वो था
05:18शुद्ध प्रेम
05:19वो प्रेम जो किसी योजना का हिस्सा नहीं था
05:23बस एक सहज बहाव था
05:25कवी
05:27तुम्हारे सादगी भरे सौंदर
05:29इन्हें पागल कर दिया है
05:30उतकर्ष प्रेम मेती दीवानगी
05:33पहले कवी मैसूस नहीं की
05:34वो भी अन देखे अंजाने शक्स के साथ प्रेम
05:37और फिर एक मासूम सा सवाल
05:40कवी
05:41ये जो तुम्हारे गाल पर
05:43तिल है क्या मैं उसे कभी छू सकूंगा
05:46वो
05:48आर्टिफिशल है
05:49उसने हस्ते हुए लिखा
05:52ये तडप उस प्रेम की है
05:55जो अन देखा था
05:57अन जाना था लेकिन
05:58सच्चा था
06:00एक ऐसा प्रेम जो
06:03शब्दों में पनपा और आत्मा में
06:05खिल गया
06:06अगर तुम चाहो
06:08तो हम इसे उस मोर तक ले जा सकते है
06:11जहां ये प्रेम
06:13अपने साहस की परीक्षा देता है
06:15जहां वक्त
06:17समाज और दूरी से
06:19लड़ता है
06:19ये अनुभूती उसक्षण की है
06:23जब एक
06:25अनाम समवाद ने जीवन की
06:27सबसे गहरी अनुभूती को छू लिया
06:29जहां प्रेम ने कोई दावा नहीं किया
06:33कोई वादा नहीं मांगा
06:35बस एक मौन सुईकार था
06:39नहीं कविता
06:42उसके नाम में एक विराम था
06:46जैसे कोई भावनाओं से भरी सांस
06:49मैंने देखा
06:51उसके गले में वही पेंडेंट जूल रहा था
06:54जिसे मैंने कभी भेजा था
06:56एक निशानी की तरह
06:59एक मौन समवाद की तरह
07:01आपने मुझे सहेज लिया
07:03मैं कृतग्य हूँ
07:05मैंने कहा
07:06उसने मुस्कुरा कर सिर्च जुका लिया
07:09जैसे यह स्वीकार उसके भीतर पहले से ही था
07:12प्रेम का यही रूप स्थाई है
07:15मैंने धीरे से कहा
07:17मैं जब भी आऊंगा
07:19तुम से मिले बगैर नहीं जाऊंगा
07:21तुम ही मेरी एक मात्र आत्मी और रिष्टिदार दोस्त
07:25या जो भी मानो
07:26जो भारत से मुझे संपर्क रखवाएगी
07:29तो मुझे प्रिये हो
07:31अपने इसी अखंडित और सौभागे से सजे पवित्र रूप में
07:35बहासपर्श का
07:37कोई रोमांच नहीं था
07:39कोई उतेजना नहीं
07:41बस एक गहरी शांती थी
07:43जैसे दो आत्माए
07:45एक ही ले में सांस ले रही हो
07:47मैंने धीरे से पूछा
07:49और वो भावनाओ बातो
07:52उसने मेरी आँखों में देखा
07:54और कहा
07:55वो जारी रहेगा कवी
07:57ये कहानी उस प्रेम की है
07:59जो शब्दों से परे है
08:01जो दूरी में भी निकट है
08:03एक ऐसा संप्रेशन
08:06जो कभी बंद नहीं होता
08:08बस रूप बदलता है
08:11अगर तुम चाहो
08:12तो हम इसे उस मोड तक
08:15ले जा सकते हैं
08:17जहां ये संप्रेशन जीवन की
08:18सबसे सची कविता बन जाता है
08:21अगर आपको ये कहानी
08:23पसंद आई हो तो कॉमेंट में
08:25जरूर करना
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