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क्या इंसान अपनी जिंदगी के आखिरी पल काशी में बिताकर मोक्ष प्राप्त कर सकता है? क्या मृत्यु का इंतजार करना भी जिंदगी का एक हिस्सा हो सकता है? फिल्म ‘मुक्ति भवन’ एक बेहद भावुक और दिल को छू लेने वाली कहानी है। इसकी कहानी दयानंद कुमार नाम के एक बुजुर्ग व्यक्ति की है, जिन्हें अचानक एहसास होता है कि उनकी जिंदगी का अंत करीब है। वह अपनी आखिरी सांस काशी में लेना चाहते हैं, इसलिए अपने बेटे राजीव के साथ वाराणसी के एक विशेष आश्रम पहुंच जाते हैं, जिसे मुक्ति भवन कहा जाता है। मुक्ति भवन में उन लोगों को रहने की जगह दी जाती है, जो अपनी मृत्यु का इंतजार करते हुए मोक्ष की उम्मीद लेकर काशी आते हैं। लेकिन पिता की इस इच्छा के कारण बेटे राजीव की जिंदगी भी बदलने लगती है। एक तरफ पिता की आखिरी इच्छा है, तो दूसरी तरफ परिवार, जिम्मेदारियां और अपनी जिंदगी की परेशानियां। यह फिल्म सिर्फ मृत्यु की कहानी नहीं है, बल्कि पिता-पुत्र के रिश्ते, जीवन के अर्थ, परिवार और इंसान की भावनाओं को बेहद खूबसूरती से दिखाती है।
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Transcript
00:03नमस्कार अच्पीर से हम आपके लिए लेक के आया है एक पारिवारी फिल्म की कहानी इस फिल्म का नाम है
00:09मुक्ति भवन जिसमें एक बेटी और उसके पीता के रिष्टे को बहुत ही खुसूरत तरीके से दिखाया गया है कि
00:15कैसे एक बेटा अपने पीता की इच्छाओं को प
00:29पिल्म मुक्ति भवन 2016 में डिलीज हुई थी कलपना कीजे को एक ऐसा इंसान जो अपने परिवार के साथ नहीं
00:38बलकी एक अंजान शहर में बिताना चाहता है क्योंकि उसे लगता है कि वहीं उसे मौत के बाद मोक्ष मिल
00:44सकता है आज की कहानी कैसी फिल्म की है जिसका नाम है
00:48मुक्ति भवन काहनी की शुरुआद होती है 77 साल के दयानंद कुमार से जिने प्यार से दया कहा जाता है
00:54एक रात उन्हें बार बर गजीव सा सपना दिखाई देता है इस सपने के बाद उन्हें महसूस होने लगता है
01:00कि अब उनकी जिंदगी के दिन पूरे हो चुके हैं दय
01:17उसके उपर घर, पत्नी और बेटी की जिम्मेदारियां है लेकिन पीता की जीत और उनकी आखरी इच्छा के लिए वो
01:23अपना काम छोड़कर उनके साथ बनारस जाता है दोनों बनारस पहुचकर कैसी जगा ठहरते हैं जिसका नाम होता है मुक्ति
01:30भवन यह कोई आम होटल न
01:44पर सकता है शुरुवात में राजीब को यह जगा बिल्कुल पसंद नहीं आती वो लगतार अपने ओफिस के फोन और
01:51घर की जिम्मेदारियों में उल्जा रहता है वहीं दुसरी तरफ दया वहां के महाल में धीरे धीरे घूलने मिलने लगते
01:57हैं वहां उनकी मुलाकात विम
02:14होती है तो कभी हसी मजाक दीरे दीरे राजीब को हैसास होने लगता है कि जिस पिता को वो इतने
02:20सालों से सिब एक जिम्मेदारी समझता था उनके अंदर भी कई इच्छाए और भावनाई चुपी हुई है पर कहानी में
02:26एक मोर तब आता है जब जब दया की तवियत खड़
02:29हो जाती है उन्हें लगता है कि अब उनका आखरी समय आ गया है परिवार और मुक्ति भवन के लोग
02:35उनके अंतिम समय की तयारी करने लगते हैं मगर दया ठीक हो जाते हैं इसी बीच बिमला की मित्ती हो
02:41जाती है जिसे दया को गहरा सद्मा लगता है वो समझ जाते हैं कि अ�
02:48केटे को घर भेज देते हैं पर कुछ समय बाद दया की भी मित्ती हो जाती है राजीब को जब
02:54यह खवर मिलती है तो वह अपने पिता के अंतिम संस्कार के लिए वापस आता है पर वह अपने पिता
02:59को दुखी होकर नहीं बलकि खुश होकर विदा करता है जो यह फिल्म हमें सं
03:14विवार के साथ हम बता दे कि आप इस फिल्म को जीयो होटस्टर पर देख सकते हैं ऐसे और भी
03:19इंट्रेस्टिंग फिल्मों के लिए हमारे साथ जूड़े रहे धन्यवाद और हमारे चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूले

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