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दिवाली पर हर घर रोशनी से जगमगाता है, लेकिन अहमदाबाद के अंधजन मंडल में इस रोशनी के पीछे एक खास कहानी भी तैयार हो रही है। यहां दिव्यांग कारीगर अपने हुनर से मिट्टी के दीये बना रहे हैं। इस पहल का उद्देश्य दिव्यांगजनों में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना और उनके लिए सम्मानजनक आजीविका के अवसर तैयार करना है।

BPA Vocational की कोऑर्डिनेटर दीपा जोशी से जुड़ी इस पहल की तस्वीरें दिखाती हैं कि सही प्रशिक्षण और अवसर मिलने पर हुनर किस तरह आगे बढ़ सकता है।

देखिए अहमदाबाद से आई ये खास तस्वीरें और जानिए कैसे ये कारीगर अपने हुनर से दिवाली की खुशियों में योगदान दे रहे हैं।

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Transcript
00:00दिवाली आने वाली है, बाजारों में रौनक है, घरों में सजावट की तयारियां चल रहे हैं और हर कोई अपने
00:06घर को रोशनी से सजाने की तयारी में जुटा है।
00:09लेकिन एहमदाबाद में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो सिर्फ अपने घरों के लिए नहीं, बलकि दूसरों की दिवाली रोशन
00:15करने के लिए भी महनत कर रहे हैं।
00:39हर दिये के पीछे महनत है, अभ्यास है और कुछ नया करने का जजबा है।
00:45यहां तयार हो रहे दिये सिर्फ दिवाली की सजावट का समान नहीं हैं, बलकि उन लोगों की काबलियत और आत्म
00:53निर्भरता की एक जहलग भी हैं।
00:55अकसर दिव्यांग जनों की बात होती है तो समाज का ध्यान उनकी चुनोतियों पर चला जाता है।
01:00लेकिन इस पहल की खासियत यह है कि यहां चर्चा उनकी क्षमता, हुनर और काम करने के अफसरों की हो
01:08रही है।
01:08दिये बनाने जैसे काम में धैर्य, अभ्यास और बारीकी की जरूरत होती है।
01:14यहां कारिगर अपने कौशल के जरिये इस काम को अंजाम दे रहे हैं।
01:18इस तरह की वोकेशनल गतिविधियां दिव्यांग जनों को केवल एक कला सीखने का मौका नहीं देती, बलकि उन्हें अपनी मेहनत
01:25के जरिये आजजीवी का कमाने और आर्थिक रूप से मजबूत बनने की दिशा भी दिखाती हैं।
01:31इस पहल से जुड़ी BPA Vocational की Coordinator दीपा जोशी भी इस काम को लेकर मौजूद है।
02:01थाकर जोशा के जरूद में अलग-अलग उनकी स्किल होती है।
02:03तो उनकी जो अच्छी स्किल है, उसको हम पहले देखते हैं।
02:06और उसके अकॉर्डइंगली हम उनको काम देते हैं।
02:10जैसे आपने देखा होगा कि DA बनाते हैं, कोई पैंटिंग करता है, कोई पैकिंग करता है, जैसे यह सब DA
02:17बनाते हैं, तो हम उसको सेल भी करते हैं, तो सेल करने में हम अलग-अलग जो कमपनियां होती है,
02:22वहाँ पे as a exhibition में हम जाते हैं, हमारे यहाँ magic finger है, तो magic finger करके एक श�
02:32जाते हैं दूसरा यह जो एक्जिबिशन होता है वहाँ पे भी हम as a staff के साथ ये दिव्यांग जन
02:39जाते हैं ताकि क्या होता है कि society को भी पता चले कि ये लोग भी कुछ कर सकते हैं
02:44और ये लोग भी जो common society उनके साथ घुल मिल सकते हैं और दूसरा है कि ये जो आते
02:50हैं तो दि�
03:01और बोज रूप भी नहीं होते हैं और उनको खुद काम करके जो वो कमाते हैं उससे उनका एक confidence
03:07भी बढ़ता है और ये जो दिए हैं वो जैसे बहुत सारे दिए बहार से आते हैं जो हम use
03:16करते हैं उसके बजाए अगर हम अपने ही दिव्यांग जन अपने ही देश के दिव्य
03:22अगर हम उसको अपने ही दिव्यांग जन ने बनाए हुए दिए को हम यूज करके अगर हम दिवाली सेलिबरेट करें
03:33तो वो एक और अलग ही रहती है और जैसे प्रधन मंत्री श्री ने बोला है कि स्वदेश ये अपना
03:39हो या तो अपने जो अपने देश में जो चीजे होत
03:52जनों को केवल सहानु भूती नहीं बलकि समान, अफसर, प्रशिक्षन और अपने हुनर को दिखाने के लिए सही मंच भी
03:59चाहिए जब किसी व्यक्ति को अपनी क्षमता के मुताबिक काम करने का अफसर मिलता है तो वो अपने पैरों पर
04:05खड़े होने की दिशा में आगे ब�
04:22पोशनी के इस्तियोहार का जश्न मनाते हैं लेकिन जरा सूचिये जिस दिए को हम कुछ रुप्यों में खरीदते हैं उसे
04:28तयार करने की पीछे किसी की कितनी महनत और लगन लगी होती है एहमदाबाद के अंदजन मंडल में तयार हो
04:35रहे ये दिए हमें उसी महनत की याद द
04:37लाते हैं ये बताते हैं कि हुनर किसी व्यक्ति या वर्ग तक सीमित नहीं होता जरूरत होती है तो बस
04:46उसे पहचानने निखारने और आगे बढ़ने का अफसर देने की इस दिवाली अगर हम ऐसे कारीगरों के बनाएं उतपादों को
04:54भी अपनी खरीदारी में जगह दें त
05:06आत्म निर्भरता तब मजबूत होती है जब महनत करने वाले हाथों को काम मिले उनके उतपादों को बाजार मिले और
05:13उनकी पहचान उनके हुनर से बने एहमदाबाद के अंधजन मंडल की ये तस्वीरें इसी सोच को सामने लाती हैं तो
05:21इस दिवाली जब आपके घर में द
05:35श्वास और आत्म निर्भरता आने से भी फैलती है

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