00:00अरे आज बड़ा बढ़ियां था, आज जो आखरी पॉइंट था, टेनिस का, अब आखरी था तो मैंने भी पूरी जान
00:05लगा के मार दिया, ऑपोनेंट का रैकेट तोड़ दिया, अज मैंने, और वो आपोनेंट कौन है, वो मेरे ही कोच,
00:19तब को निकालना होता है, क्या, निक
00:25क्योंकि जब आप वो नहीं निकाल पाते हैं, तो भीतर हीनता बैठ जाती है, कई तो जिस टाइनिंग टेबल पर
00:31खा रहे होंगे, उसी डाइनिंग टेबल पर कोई मास भी खा रहा होता है, और वो उठ भी नहीं सकते,
00:36भीतर आक्रोश बैठ जाता है, ऐसा आक्रोश यो च�
00:52सामर थे नहीं, तो आओ गालियां दो, यहां से शुरुआत करो, कम से कम यह यकीन तो आए कि विरोध
01:01करना संभव है, कहीं से तो शुरुआत करो, एक प्रमान तो मिले, विरोध करने वाली आवाज कभी सुनी ही नहीं
01:08है, नहीं सुनी है न, उस आवाज को सुनना शुरू कर
01:21होगे कि जवाब वो नहीं निकाल पते तो भीतर हीनता बैठ जाती है
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