00:28नमस्कार।
00:30सूक्ष्म ज्यान का, चेतना का, आत्मा का क्षित्र है।
00:33ज्यान का अर्थ है कि संपूर्ण स्रिष्टी के केंद्र में एक ही इश्वर है।
00:39हम सभी टानी एक ही कुटुम्ब के अंग हैं वसुधैव कुटुम्ब कम।
00:43इस थूल रूप में वही विभिनस्वरूपों में बटा हुआ है, यही उसका विज्यान भाव है।
00:49हम टान रूप शरीर नहीं है, आत्मा है, जो न जन्म लेता है, नहीं मरता है।
00:55इसका यह अर्थ तो सपष्ट है कि माबाप आत्मा को पैदा नहीं कर सकते केवल इस थूल शरीर को पैदा
01:02करते हैं और मैं शरीर नहीं हूँ, तब मेरा माता पिता से संबंद कैसा।
01:07Years who I am the dream that I am madre in my work.
01:10zeros do all this ingenuity between Myr flaws and I have left my love I just believe more or less
01:16then I友ak who supports.
01:19My understanding is all my común is all I have in my heart.波
01:29that I am wearing ключ and twists I also adopt my philosophy
01:38ुप्योग कर पाना, अपनी क्षमताओं का विकास, आस्था का विकास करके ज्यान और कर्म का संतुलन बनाये रखना।
01:47१र्म आधारित अर्थ और काम के साहरे मोक्ष मार्ग में इस्थिर हो जाना मेरा पुरुशार्थ है।
01:54इसके लिए प्रक्रती दो विशेश धाराओं में एक साथ मेरे लिए काड़े करती है।
02:13वस्तु स्थूल है द्रिश्यमान है, शब्द सूक्ष्म है अद्रिश्य है।
02:18श्रिश्टी सदा सूक्ष्म से स्थूल की और बढ़ती है। आत्मा जीवात्मा के रूप में द्रिश्टा है, परा अपरा प्रक्रती ही
02:26जीवन को चलाती है।
02:45Drugaul Adha
02:57लक्ष्मी है जिसके पीछे संपून विश्व की चेतना दौड रही है।
03:28यही सफलता का मापदंड भी बन गया। कितना भी कमाओ कम लगता है। उपयोग केवल सुख के लिए, भोग के
03:36लिए। पैसे भी धन की तीन ही अवस्थाएं होती हैं। दान, भोग और नाश। देना शिक्षित वर्ग के शब्द कोश
03:44में होता ही नहीं। भोग में आहार, न
03:47भिद्रा, भर, मैथुन। यह पाश्विक भाव हैं। इस द्रिष्टी से शरीर भी पशू ही है। धनारजन में यदि अधर्म साधन
03:56बनता है, तो नाश होना ही है। जब तक ऐसा धन रहता है, तब तक विनाश भी रहता है। सरस्वती
04:03का क्षेत्र अतिसूख्ष्म हैं, व
04:16रश्टाक्षर एवच शरह सरवाणी भूतानी कूटस्थो अक्षर उच्चते गीता 15.16 यह अक्षर ही इश्वर स्रिष्टी का क्षेत्र है। रदेयस्त
04:28केंदरस्त ब्रह्मा ही स्रिष्टा है। सरस्वती ब्रह्मा की ही शक्ती है और शब्द ब्रह्म की अधिश्ठात्री
04:34भी है। सरस्वती को शब्द ज्ञान के अर्थ में ध्वनी के स्पंद रूप में जपादिक छेत्र का परियाय कहा है।
04:42शब्द बाक से ही अर्थ बाक को पैदा करते देखा जा सकता है। जब हवन मंत्रो चार आदी के माध्यम
04:49से भौतिक सिध्धियां प्राप्त करना आम �
04:53यहां तक कि प्रार्थना की शक्ति को सभी धर्मों में मान्यता प्राप्त है। ज्ञान को जीवन का श्रेष्ठतम आभुशन कहा
05:01गया है। व्यक्ति जब ज्ञान और सम्रिध्धी दोनों में सात्विक रूप से प्रतिष्ठित रहता हैं तभी समाज में शीर्ष कोटी
05:10का स
05:20ुप्योग का क्षेत्र रह गया, ज्यान का क्षेत्र भी भौतिक शिक्षा पर आकर ठहर गया।
06:09पदा की और किसी का ध्यान तक नहीं जाता।
06:10पक को तै करता है।
06:12ज्यानी धनवान नहीं हो पाता, आश्रित हो जाता है।
06:16पहले भी राज्याश्रे में ही विद्वान पलते थे।
06:19जहां भी लक्षमी सरस्वती साथ हैं, वहीं यश एवं श्री का साम्राज्य है।
06:24बिना ज्यान का जीवन जड़ता का अंधकार है, एहंकार है।
06:29विनाश की आहट है, ज्यान अमृत है, लक्षमी मृत्यू है।
06:33दोनों साथ हैं तो मुक्ती है, रस है, आनंद है।
06:38नमस्कार।
06:38झाल
06:39झाल
06:40झाल
06:40झाल
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