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  • 6 minutes ago
भोग नहीं, जीवन का बोध

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00:02नमस्कार, मैं श्वेता तिवारी आप सभी का अभिनंदन करती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रिका के ब्रधान संपादक,
00:10वित्या वाचसपती गुलाब कोठारी जी का परिवार में प्रकाशित आलेक, जिसका शीशक है भोग नहीं जीवन का बो
00:29करते थे, कोई भी पराया नहीं था, रिष्टों में कडवाहट नहीं थी, सभी एक दूसरे के सहयोग से अपने अपने
00:37जीवन के प्रती सजग रहते थे, अध्यात्म भी सभी के मन को छूता था, न कोई दुराव था नहीं छिपाव,
00:45पड़ोसी, रिष्टेदार, परीजन,
00:47सभी सुख दुख में पूर्ण मनोयोग से भागिदारी निभाते थे, अभाव किसी के भी मन में नहीं था, इर्ष्या भाव
00:55भी नहीं था, जीवन सरल्व सहज था, हाँ बहुतिक संसादन भले ही, आज जैसे नहीं थे, किन्तु फिर भी जीवन
01:03में सुख व सम्मान था, आ�
01:09आंतरिक मुल्यों का खालीपन गहराता जा रहा है, सांस्रितिक परंपराएं आज रूडी वाधिता का हिस्सा बन कर रह गई, देह
01:18ही एक मात्र लक्षिय हो गया, आत्मा खो गया, धैर्य संघर्ष का सुख है ही नहीं, क्यूंकि भोग ही उनका
01:27अंतिम सत्य और द्रिष्टी
01:29हो गया है, इसने मानव को भी संसाधन बना दिया, भोग जितना बढ़ता है त्रिप्ती उतनी ही घटती है, नित
01:38नई वस्तूओं के प्रती आकरशन बढ़ने से वस्तूवाधावी हो गया, आत्मबाद खो गया, आज व्यक्ति पुर्शार्थ चतुष्टे के चारों अंग
01:59वो भूल बैठी, सत्ता, पद, अभिजाक्तिय जीवन ही उनको आकरिष्ट कर रहा है, संतान के प्रती उनकी कर्तव्य मात्र सुख
02:07सुविधा जुटा कर देने तक सीमित हो गया, पिता भी उसी धन प्राप्ति की अंधी दोड में लगा है, परिवार
02:14का सुख धन रूप हो �
02:16स्वस्थ पारिवारिक पातावरण के अभाव में संताने भी जीवन के प्रती उदारवादी द्रिष्टी कोन को नहीं समझ पा रही है,
02:25तब ऐसे में तकनीक ही उनके अकेले पन में सहायक बनता है, अपनी अनुभवहीन बुद्धी से वे उस ज्ञान को
02:32कितना और किस रू�
02:34पहन कर पाते हैं, यहां आज की पीड़ी के व्यवार से स्पष्ट ही हो रहा है, आज के युवा भोग
02:41को सफलता समझ रहे हैं, जबकि पास्तविक सफलता तो संतोष और सार्थक्ता में है, उन्होंने यहां कभी नहीं सीखा कि
02:50प्राप्ति से जादा सुख अनुभव करने म
02:52और साजा करने में हैं, उनके लिए रिष्टे भी भोग की वस्तू हो गए हैं, जब तक उनकी जरूरतें पूरी
03:01होती हैं, तब तक वे उस व्यक्ती से जुड़े रहते हैं, किन्तु जैसे ही भोग का स्रोथ सूखता है, वैसे
03:08ही रिष्टा समाप्त करने में भी उनको देद
03:10नहीं लगती, धैर्यद, प्रतीक्षा और त्याग जैसे शब्द उनके लिए कोई महत्व नहीं रखते, धन का अभाव नहीं होने से
03:19सब कुछ उनके लिए अधिकार बन जाता है, उपहार नहीं, जैसे खाना, कपड़े, छुटियां, खिलोने आदी, यही आदितें उन्हे
03:28शनिक सुख का आदी बना देती है, इस भोग द्रिष्टी का एक मात्र प्रतिकार आध्यात्मिक मार्वी है, आध्यात्मिकता उन्हें द्रिष्टा
03:37बनना सिखाती है, भोगता नहीं, उन्हें धिरे धिरे समझ आने लगता है कि जो हमें मिला है, वो हमारी योग्यता
03:47से नही
03:47बलकि किसी ईश्वर ये प्राप्रतिक या अपने बढ़ों की खृपा से मिला है।
03:52इससे उनमें अनावश्यक एहंकार का भाव समाप्त होगा।
03:57हालांकि ये दोश केवल बच्चों का नहीं है।
04:00यहीं द्रिष्टी माता-पिता, परिवार या समाच से ही उनको प्राप्त हो रही है।
04:05ऐसे में नई पीढ़ी को संसकारित करने का दाईत्व हम सभी का है।
04:09क्योंकि बच्चा जो देखता है उसी का अनुकरन करता है।
04:14माता-पिता को स्वयम ही आध्यात्मिक मार्ग उपर चलना होगा।
04:18दिखावटी आच्रन से बचना होगा और धन पद आधी का मोह छोड़कर परिवार के साथ समय बिताना होगा।
04:27जब तक वेश्वयम सुख और शान्ती को पैसे से उपर नहीं समझेंगे तब तक संतान भी उनहीं के मार्ग पर
04:34चलेंगी।
04:35माता-पिता को बच्चों के हर भोग को आसानिस से उपलब्ध नहीं कराना चाहिए।
04:40उन्हें छोटी-छोटी असफलताएं और कम्यों का सामना करने देना चाहिए।
04:46समय का चक्र बड़ा ही बलवान है। सुख और दुख शनिक अवस्थाएं हैं।
04:51और क्रम से प्रत्यक व्यक्ति के जीवन में आती-जाती रहती हैं।
04:56हमें हमारी संतानों को किवत सुख का भोग करने का सामर्थ नहीं देना चाहिए बलकि उन्हें दुख भोग के प्रतीवी
05:05सचेत रखना चाहिए।
05:07ताकि बुरे समय में उनका मनोबल न डूटे। वे उस समय में भी अपने जीवन को सायम और सुख के
05:15साथ व्यतीत कर सकें।
05:17समय रहते यदि हम नहीं संबलें तो आने वाली पिली भोग की पराकाश्ठा पर पहुच जाएगी।
05:24ऐसे में भारतिय संस्रिती, परंपरा, संसकारों, जीवन मूल्यों आधी का हरास निश्चित है।
05:31नमस्कार।
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