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जाने-माने शायर और वैज्ञानिक गौहर रज़ा की कविता- सच ज़िंदा है, उनके नए संग्रह सरकशी से...
जब सब ये कहें ख़ामोश रहो
जब सब ये कहें कुछ भी ना कहो
जब सब ये कहें, है वक़्त बुरा
जब सब ये कहें,
ये वक़्त नहीं, बेकार की बातें करने का
जब सब ये कहें कुछ समझो तो
जब सब ये कहें कुछ सोचो तो
जब सब ये कहें
कलियों का चटकना क्या कम है
फूलों का महकना क्या कम है
शाख़ों का लचकना क्या कम है
बिंदिया का चमकना क्या कम है
ज़ुल्फ़ों का बिखरना क्या कम है
प्यालों का छलकना क्या कम है
जब इतना सब है, कहने को
जब इतना सब है लिखने को
क्या ज़िद है के ऐसी बात करो
जिस बात में ख़तरा जान का हो
जब सब ये कहें, ख़ामोश रहो
जब सब ये कहें, कुछ भी ना कहो
तब समझो, पतझड़ रुत आई
तब समझो मौसम दार का है
तब सहमी, सहमी रूहों को
ये बात बताना लाज़िम है
आवाज़ उठाना लाज़िम है
हर क़र्ज़ चुकाना लाज़िम है
जब सब ये कहें, ख़ामोश रहो
जब सब ये कहें, कुछ भी ना कहो
तब समझो कहना लाज़िम है
मैं ज़िंदा हूं, सच ज़िंदा है,
अल्फ़ाज़ अभी तक ज़िंदा हैं।
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Transcript
00:00सच जिन्दा है
00:02जब सब ये कहें खामोश रहो
00:05जब सब ये कहें कुछ भी न कहो
00:07जब सब ये कहें है वक्त बुरा
00:10जब सब ये कहें ये वक्त नहीं
00:13बेकार की बातें करने का
00:15जब सब ये कहें कुछ सोचो तो
00:18जब सब ये कहें कुछ समझो तो
00:21जब सब ये कहें कलियों का चटकना क्या कम है फूलों का महकना क्या कम है शाखों का लचकना क्या
00:29कम है बिंदिया का चमकना क्या कम है प्यालों का छलकना क्या कम है जब इतना सब है कहने को
00:37जब इतना सब है लिखने को
00:40क्या जिद है के ऐसी बात करो जिस बात में खत्रा जान का
00:44जब सब ये कहें खामोश रहो
00:47जब सब ये कहें कुछ भी न कहो
00:50तब समझो पटजर रुताई
00:52तब समझो मौसमदार का है
00:55तब सहमी सहमी रूहों को
00:58ये बात बताना लाजम है, आवाज उठाना लाजम है, हर कर्स चुकाना लाजम है
01:05जब सब ये कहें खामोश रहो, जब सब ये कहें खुछ भी न कहो
01:10तब समझो कहना लाजम है
01:13मैं जिन्दा हूं
01:14सच जिन्दा है
01:16अलफाज अभी तक जिन्दा है
01:18अलफाज अभी तक जिन्दा है
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