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बेबाक भाषा के खास podcast में पत्रकार भाषा सिंह और मुकुल सरल बात कर रहे हैं जाने-माने शायर, वैज्ञानिक और एक्टिविस्ट गौहर रज़ा के साथ जिनकी नई किताब सरकशी हाल ही में आई है। साथ ही जान रहे हैं कि आज के माहौल में सरकशी के मायने और ज़रूरत कैसी है...
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Transcript
00:02दिली अगमगीन है अगर तो क्या, रात संगीन है अगर तो क्या, सुबह आएगी, नूर बिखरेगा, खेलते खेलते सफर अपना,
00:13मन्जिलों का पता बताएगा
00:16नमशकार दोस्तों, बेवाग भाशा में आपका स्वागत है, इस समय में मौझूद हूँ, गोहर रजा साहब के साथ, उनकी किताब
00:24सरकशी सबके सामने आई है, इस पे चर्चा चालू है, लेकिन सबसे एहम बात, गोहर जी, आप शायर हैं, आप
00:35विज्ञानिक हैं, साथ ही सा
00:40आपके जरीए अईलान कर रहे हैं, कि सरकशी की तमना अब हमारे दिल में है, यह जो नारा है, यह
00:46दोहजार छब्शम में आ रहा है, यह नारा जब उठा था तो हम गलाम thे, सर्फरोशी के साथ सरकशी जी,
00:56सर्फरोशी की तमना अब हमारे दिल में
00:59और उस वक्त सरकशी को लेकर के बड़ी सारी नजमे लिखी गए
01:03ये लफ्स भी बहुत प्रचलित था
01:07आज के दोर में फिस्से ऐसा लग रहा है
01:09कि हिंदुस्तान में कम से कम सोच तो आजाद नहीं रही है
01:14बोलने की आजादी नहीं रही है
01:16और अभी जो प्रदान मंतरी ने अपना वेयान दिया है
01:21दिमागी नकसल का
01:22वहाँ वो सोच को भी खैद कर लेना चाहते है
01:25किसी पर भी इंजम लगाया जा सकता है बहुत आसानी के साथ
01:28कि भई तुम सोच रहे थे तुम दिमागी तोर पे
01:31और उसको जो भी जिलना पड़े फिर उसके बाद
01:35कोई भीर रस्ता चलते कह सकती है
01:38कि तुम सोच रहे थे
01:40इसलिए दिमागी नकसल हो
01:42सड़क के उपर
01:44और उसके साथ कुछ भी हो सकता है
01:46मैं यह ऐसी बात नहीं कह रहा
01:48जो नहीं हुई
01:49क्योंकि अलग-अलग समझाए के लोगों को
01:52बस इतना ही
01:55सोचने पर
01:55देखने पर
01:56तुम टोपी लगाए हो, तुम पजामा पहने हो
01:59तुम कुर्ता पहने हो, तुम धोती पहने हो
02:01तुम मुन्डू पहने हो
02:17दिमागी नक्सली का अगर ये मतलब है कि दिमाग से सोचते है तो फिर मैं दिमागी नक्सली हूँ
02:24अगर दिमागी नक्सली का ये मतलब है कि क्या आप सवाल करते हैं तो फिर मैं दिमागी नक्सली हूँ
02:32अगर आप ये दिमागी लक्सली से मतलब निकालते हैं
02:36कि मैं अपने जिमाग में जो बातें आती हूं
02:40उनको बेबाक तरीके से रखने के लिए तैयार हूं
02:43सबके सामने, तो हाँ, मैं दिमागी लक्सली हूं
02:46लेकिन अगर आपका मकसद ये है
02:48कहना कि मैं एंटी नैशनल हूँ, मैं हिंसक हूँ, मैं बंदोग उठाना चाहता हूँ, मैं सत्ता को हिंसा के द्वारा
03:00चालेंज करना चाहता हूँ, तब नहीं हूँ
03:02लेकिन आज अगर कोई मुझसे ये पूछेगा कि दिमागी नकसली होने का क्या मतलब है, तो मुझे नहीं मालूम, ये
03:08लेबिल तो किसी पे भी लगाए जा सकता है, आप यहां बैठे हैं, आपके आद में माईक है, कोई कहे
03:12के नहीं, आप दिमागी नकसली हैं, मैं ये कह रहा
03:29है, तो उपर और कोई लेबल नहीं लगाना चाहता, मैं सरकश हूँ, मेरी नजमे सरकशी की तरफ इशारा करती हैं,
03:39मैं उन लोगों को अपना पूर वज मानता हूँ, जिनों अंग्रेजों के दमन के दोर में, बिलकुल वेबागी के साथ,
03:50बहुत हिम्मत के साथ इस तरह की
03:52नजमे लिखी ही जो चैलेंज करती ही और आज के बचचे लिख रहे हैं, मैं अकेला नहीं।
04:23रखना आसान नहीं होता है
04:24पोएम कभी आसान नहीं होता है
04:26कहानी कभी टाइटल आसान नहीं होता है
04:28उसमें सबसे ज़्यादा वक्त लगता इशाथ सोचने में
04:31सरकशी इसलिए रखा कि ये प्रतिरोध की कविताओं का सिलेक्शन था
04:36सरकशी का मतलब होता है
04:40किसी के आँखों में आँखे डाल करके ये कह सके के मुझे तुमारी बात मन्जूर नहीं
04:45आप उसे सवाल पूछ सके
04:47आप कह सके के मेरे दिल में क्या है बिना डिड़क बिना डरके
04:51और ऐसे में मुझे ऐसा लगा कि इस किताब के लिए सबसे बेहतर टाइकल होगा सरकशी
05:00क्योंकि ये सारी प्रतिरोत की कविताएं जो मैंने पिछले 50 साल में लिखी उनका एक सेलेक्शन है
05:07ये मेरा 50 साल का सफर समझ ली जाएगी
05:12कुछ लोगों ने कहा कि सरकशी थोड़ा मुश्किल लब्स है
05:17तो मैंने कहा कि कविताओं में बहुत सारे मुश्किल लब्स होते है
05:21अगर कविताओं को समझना है तो ऐसा तो है नहीं कि आपको सारे अलपास पता हो आपको सारे शब्स पता
05:28हो
05:29इसी तरह से बहुत सारी किताबों के टाइटल सेते हैं
05:32जिनको देखने के बाद आप में जिग्यासा पैदा होती है
05:36कि उनको जानने की कोशिश करें
05:40लेकिन एक बात और फैस ताप की याद आई
05:43कि अब हमी सब कुछ करें क्या
05:46कुछ तो पाठक को भी करना होगा
05:48इस जमी पर तो प्यार बिखरा है
05:52धर्म के नाम पर सियासत में इतनी अफरत कहां से लाते हो
05:57इस जमी पर तो प्यार बिखरा है
05:59जिसको गुद्रत ने खुद समा रहा है
06:02ढलते दूरत पे एक नजर डालो
06:05ढलते सूरच पे एक नजर डालो
06:08उसके दामन में अबर का टुकड़ा महवे है रथू लाखों रंगों से
06:13खेलता है के जैसे सारे रंग अब बिखेरेगा तब बिखेरेगा
06:19और हंगा में रंगों बू के तो फैल इन हवाओं में इन फिजाओं में
06:25अमन के सुर बिखरते देखोगे उसको देखो जरा नजर भरके एक जरा ठहरो चांद निकलेगा अपने दागों को दूद में
06:36धोकर
06:37आस्मा की बिसात पर देखो सारे तारों के नर्म महरों को एक एक करके फिर सजाएगा और तुमसे करेगा सरगोशी
06:49जब हम बात कर रहे हैं आप जिक्र कर रहे हैं स्कूल का सवाल उठाया एक नौजवान ने पश्चिम बंगाल
06:55में उसके वालिद को मा डाला गया
06:59सिर्फ तो सवाल उठाना और सवाल उठाने पर जब इतनी तगड़ी पॉलिटेक्स हो रही है आप सरकशी की बात कर
07:08रहे हैं
07:09सरकशी इसलिए जरूरत होती है समाज के अंदर के जो डर का जवाब है वो सिर्फ सरकशी ही हो सकती
07:17है
07:18डर का जवाब डर के रहना नहीं हो सकता डर का जवाब सत्ता के सामने सर जुकाने नहीं हो सकता
07:25अपने घुटनों टेकना नहीं हो सकता खमोश रहना नहीं हो सकता सरकशी ही उसका जवाब हो सकती है
07:31और कोई जवाब अवाम के पास, जंता के पास, मजदूरों के पास, किसानों के पास, दलितों के पास, अल्प संख्य
07:38को पास और कोई जवाब नहीं हो सकता
07:41मैं नहीं समझता कि कभी भी हमको इंसा का रास्ता अपनाना चाहिए
07:46लेकिन जो बात सरकशी के अंदर है
07:49मैं समझता हूँ उससे सत्ताइं डील कर ही नहीं पाती
07:54उनकी समझ में नहीं आता कि ये अहिंसक लोग सरकशी कर रहे हैं
07:58जो बच्चों ने दिखा दिया जो किसानों ने दिखा दिया और अब स्कूल के तालबेल में दिखा रहे हैं
08:04सुबह दम चल के घास पर देखो प्यार की दुन में लाखों बूदों को अमन के गीत काते पाओगे
08:18और सबाब पास से जो गुजरेगी तुमको एहसास बस यही होगा जैसे कहदी किसीन प्यार की बाद बिकरे पूलों ने
08:31लाखों रंगों से सारे गुल्शन को यूं सजाया है जैसे कहते हूं एक जरा सोचो इश्क की कोई हद नहीं
08:39होती
08:45बहते दरिया के नर्म मौजे हो या के सहरा में रेत के जर्रे परवतों की हसीन वाली या बिकरी बिकरी
08:54सी बर्फ की परते
08:57जूमते गाते सारे जर्ने भी हमको पेगामें अमन देते हैं और चाहो तो आखें बंद कर लो दिल की आवाज
09:10को सुनो पैहम धड़कने तुमको ये बताएंगी इस जमी पर तो प्यार विकराएं नफरतें बस सियासतों में हैं हर सियासत
09:20के एते पहलो
09:24दिल से अपने निकालना होगा हमन के आशिती के पैकर में हर सियासत को ठालना होगा
09:34तो इस किताब से आपको क्या उमीद है क्योंकि आपकी विज्ञान वाली किताब बहुत चली बहुत अलग-अलग तपकों में
09:45उसमें चर्चा हुई अब सरकशी से आपको क्या उमीद है
09:48दिखे मुझे उमीद ये है कि हमारी नई नसले उठेंगी आज शायद इस किताब को पढ़ें लेकिन एक ऐसा समाज
10:00बनाएंगी जहां ये किताब रद्धी की टोकरी के लायक हो जाए
10:05जहां किसी को सरकशी की जरूरत न पढ़े जहां बात सुनी जाए जहां नई नसलों से बातचीत हो जहां खुल
10:13के लोग कह सकें कि हमारे दिन में ये है तुम्हारे दिल में क्या है चलो बैट करके बातचीत करते
10:19है एक ऐसा समाज जहां लोग बराबर होंगे तब मेरे ख्या
10:35जब सब ये कहें खामोश रहो, जब सब ये कहें कुछ भी न कहो, जब सब ये कहें है वक्त
10:43बुरा, जब सब ये कहें ये वक्त नहीं बेकार की बातें करने का।
11:05प्यालों का छ्छलकना क्या कम है? जब इतना सब है कहने को, जब इतना सब है लखने को, क्या जद
11:14है के ऐसी बात करो जस बात में खत्रा जान का?
11:17जब सब ये कहें खामोश रहो जब सब ये कहें कुछ भी न कहो तब समझो पच्जर रुताई
11:25तब समझो मौसमदार का है तब सहमी सहमी रूहों को ये बात बताना लाजम है
11:33आवाज उठाना लाजम है हर कर्स चुकाना लाजम है
11:38जब सब ये कहें खामोश रहो
11:41जब सब ये कहें कुछ भी न कहो
11:43तब समझो कहना लाजम है
11:46मैं जिन्दा हूं
11:47सच जिन्दा है
11:49अलफाज अभी तक जिन्दा है
11:51अलफाज अभी तक जिन्दा है
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