00:02दिली अगमगीन है अगर तो क्या, रात संगीन है अगर तो क्या, सुबह आएगी, नूर बिखरेगा, खेलते खेलते सफर अपना,
00:13मन्जिलों का पता बताएगा
00:16नमशकार दोस्तों, बेवाग भाशा में आपका स्वागत है, इस समय में मौझूद हूँ, गोहर रजा साहब के साथ, उनकी किताब
00:24सरकशी सबके सामने आई है, इस पे चर्चा चालू है, लेकिन सबसे एहम बात, गोहर जी, आप शायर हैं, आप
00:35विज्ञानिक हैं, साथ ही सा
00:40आपके जरीए अईलान कर रहे हैं, कि सरकशी की तमना अब हमारे दिल में है, यह जो नारा है, यह
00:46दोहजार छब्शम में आ रहा है, यह नारा जब उठा था तो हम गलाम thे, सर्फरोशी के साथ सरकशी जी,
00:56सर्फरोशी की तमना अब हमारे दिल में
00:59और उस वक्त सरकशी को लेकर के बड़ी सारी नजमे लिखी गए
01:03ये लफ्स भी बहुत प्रचलित था
01:07आज के दोर में फिस्से ऐसा लग रहा है
01:09कि हिंदुस्तान में कम से कम सोच तो आजाद नहीं रही है
01:14बोलने की आजादी नहीं रही है
01:16और अभी जो प्रदान मंतरी ने अपना वेयान दिया है
01:21दिमागी नकसल का
01:22वहाँ वो सोच को भी खैद कर लेना चाहते है
01:25किसी पर भी इंजम लगाया जा सकता है बहुत आसानी के साथ
01:28कि भई तुम सोच रहे थे तुम दिमागी तोर पे
01:31और उसको जो भी जिलना पड़े फिर उसके बाद
01:35कोई भीर रस्ता चलते कह सकती है
01:38कि तुम सोच रहे थे
01:40इसलिए दिमागी नकसल हो
01:42सड़क के उपर
01:44और उसके साथ कुछ भी हो सकता है
01:46मैं यह ऐसी बात नहीं कह रहा
01:48जो नहीं हुई
01:49क्योंकि अलग-अलग समझाए के लोगों को
01:52बस इतना ही
01:55सोचने पर
01:55देखने पर
01:56तुम टोपी लगाए हो, तुम पजामा पहने हो
01:59तुम कुर्ता पहने हो, तुम धोती पहने हो
02:01तुम मुन्डू पहने हो
02:17दिमागी नक्सली का अगर ये मतलब है कि दिमाग से सोचते है तो फिर मैं दिमागी नक्सली हूँ
02:24अगर दिमागी नक्सली का ये मतलब है कि क्या आप सवाल करते हैं तो फिर मैं दिमागी नक्सली हूँ
02:32अगर आप ये दिमागी लक्सली से मतलब निकालते हैं
02:36कि मैं अपने जिमाग में जो बातें आती हूं
02:40उनको बेबाक तरीके से रखने के लिए तैयार हूं
02:43सबके सामने, तो हाँ, मैं दिमागी लक्सली हूं
02:46लेकिन अगर आपका मकसद ये है
02:48कहना कि मैं एंटी नैशनल हूँ, मैं हिंसक हूँ, मैं बंदोग उठाना चाहता हूँ, मैं सत्ता को हिंसा के द्वारा
03:00चालेंज करना चाहता हूँ, तब नहीं हूँ
03:02लेकिन आज अगर कोई मुझसे ये पूछेगा कि दिमागी नकसली होने का क्या मतलब है, तो मुझे नहीं मालूम, ये
03:08लेबिल तो किसी पे भी लगाए जा सकता है, आप यहां बैठे हैं, आपके आद में माईक है, कोई कहे
03:12के नहीं, आप दिमागी नकसली हैं, मैं ये कह रहा
03:29है, तो उपर और कोई लेबल नहीं लगाना चाहता, मैं सरकश हूँ, मेरी नजमे सरकशी की तरफ इशारा करती हैं,
03:39मैं उन लोगों को अपना पूर वज मानता हूँ, जिनों अंग्रेजों के दमन के दोर में, बिलकुल वेबागी के साथ,
03:50बहुत हिम्मत के साथ इस तरह की
03:52नजमे लिखी ही जो चैलेंज करती ही और आज के बचचे लिख रहे हैं, मैं अकेला नहीं।
04:23रखना आसान नहीं होता है
04:24पोएम कभी आसान नहीं होता है
04:26कहानी कभी टाइटल आसान नहीं होता है
04:28उसमें सबसे ज़्यादा वक्त लगता इशाथ सोचने में
04:31सरकशी इसलिए रखा कि ये प्रतिरोध की कविताओं का सिलेक्शन था
04:36सरकशी का मतलब होता है
04:40किसी के आँखों में आँखे डाल करके ये कह सके के मुझे तुमारी बात मन्जूर नहीं
04:45आप उसे सवाल पूछ सके
04:47आप कह सके के मेरे दिल में क्या है बिना डिड़क बिना डरके
04:51और ऐसे में मुझे ऐसा लगा कि इस किताब के लिए सबसे बेहतर टाइकल होगा सरकशी
05:00क्योंकि ये सारी प्रतिरोत की कविताएं जो मैंने पिछले 50 साल में लिखी उनका एक सेलेक्शन है
05:07ये मेरा 50 साल का सफर समझ ली जाएगी
05:12कुछ लोगों ने कहा कि सरकशी थोड़ा मुश्किल लब्स है
05:17तो मैंने कहा कि कविताओं में बहुत सारे मुश्किल लब्स होते है
05:21अगर कविताओं को समझना है तो ऐसा तो है नहीं कि आपको सारे अलपास पता हो आपको सारे शब्स पता
05:28हो
05:29इसी तरह से बहुत सारी किताबों के टाइटल सेते हैं
05:32जिनको देखने के बाद आप में जिग्यासा पैदा होती है
05:36कि उनको जानने की कोशिश करें
05:40लेकिन एक बात और फैस ताप की याद आई
05:43कि अब हमी सब कुछ करें क्या
05:46कुछ तो पाठक को भी करना होगा
05:48इस जमी पर तो प्यार बिखरा है
05:52धर्म के नाम पर सियासत में इतनी अफरत कहां से लाते हो
05:57इस जमी पर तो प्यार बिखरा है
05:59जिसको गुद्रत ने खुद समा रहा है
06:02ढलते दूरत पे एक नजर डालो
06:05ढलते सूरच पे एक नजर डालो
06:08उसके दामन में अबर का टुकड़ा महवे है रथू लाखों रंगों से
06:13खेलता है के जैसे सारे रंग अब बिखेरेगा तब बिखेरेगा
06:19और हंगा में रंगों बू के तो फैल इन हवाओं में इन फिजाओं में
06:25अमन के सुर बिखरते देखोगे उसको देखो जरा नजर भरके एक जरा ठहरो चांद निकलेगा अपने दागों को दूद में
06:36धोकर
06:37आस्मा की बिसात पर देखो सारे तारों के नर्म महरों को एक एक करके फिर सजाएगा और तुमसे करेगा सरगोशी
06:49जब हम बात कर रहे हैं आप जिक्र कर रहे हैं स्कूल का सवाल उठाया एक नौजवान ने पश्चिम बंगाल
06:55में उसके वालिद को मा डाला गया
06:59सिर्फ तो सवाल उठाना और सवाल उठाने पर जब इतनी तगड़ी पॉलिटेक्स हो रही है आप सरकशी की बात कर
07:08रहे हैं
07:09सरकशी इसलिए जरूरत होती है समाज के अंदर के जो डर का जवाब है वो सिर्फ सरकशी ही हो सकती
07:17है
07:18डर का जवाब डर के रहना नहीं हो सकता डर का जवाब सत्ता के सामने सर जुकाने नहीं हो सकता
07:25अपने घुटनों टेकना नहीं हो सकता खमोश रहना नहीं हो सकता सरकशी ही उसका जवाब हो सकती है
07:31और कोई जवाब अवाम के पास, जंता के पास, मजदूरों के पास, किसानों के पास, दलितों के पास, अल्प संख्य
07:38को पास और कोई जवाब नहीं हो सकता
07:41मैं नहीं समझता कि कभी भी हमको इंसा का रास्ता अपनाना चाहिए
07:46लेकिन जो बात सरकशी के अंदर है
07:49मैं समझता हूँ उससे सत्ताइं डील कर ही नहीं पाती
07:54उनकी समझ में नहीं आता कि ये अहिंसक लोग सरकशी कर रहे हैं
07:58जो बच्चों ने दिखा दिया जो किसानों ने दिखा दिया और अब स्कूल के तालबेल में दिखा रहे हैं
08:04सुबह दम चल के घास पर देखो प्यार की दुन में लाखों बूदों को अमन के गीत काते पाओगे
08:18और सबाब पास से जो गुजरेगी तुमको एहसास बस यही होगा जैसे कहदी किसीन प्यार की बाद बिकरे पूलों ने
08:31लाखों रंगों से सारे गुल्शन को यूं सजाया है जैसे कहते हूं एक जरा सोचो इश्क की कोई हद नहीं
08:39होती
08:45बहते दरिया के नर्म मौजे हो या के सहरा में रेत के जर्रे परवतों की हसीन वाली या बिकरी बिकरी
08:54सी बर्फ की परते
08:57जूमते गाते सारे जर्ने भी हमको पेगामें अमन देते हैं और चाहो तो आखें बंद कर लो दिल की आवाज
09:10को सुनो पैहम धड़कने तुमको ये बताएंगी इस जमी पर तो प्यार विकराएं नफरतें बस सियासतों में हैं हर सियासत
09:20के एते पहलो
09:24दिल से अपने निकालना होगा हमन के आशिती के पैकर में हर सियासत को ठालना होगा
09:34तो इस किताब से आपको क्या उमीद है क्योंकि आपकी विज्ञान वाली किताब बहुत चली बहुत अलग-अलग तपकों में
09:45उसमें चर्चा हुई अब सरकशी से आपको क्या उमीद है
09:48दिखे मुझे उमीद ये है कि हमारी नई नसले उठेंगी आज शायद इस किताब को पढ़ें लेकिन एक ऐसा समाज
10:00बनाएंगी जहां ये किताब रद्धी की टोकरी के लायक हो जाए
10:05जहां किसी को सरकशी की जरूरत न पढ़े जहां बात सुनी जाए जहां नई नसलों से बातचीत हो जहां खुल
10:13के लोग कह सकें कि हमारे दिन में ये है तुम्हारे दिल में क्या है चलो बैट करके बातचीत करते
10:19है एक ऐसा समाज जहां लोग बराबर होंगे तब मेरे ख्या
10:35जब सब ये कहें खामोश रहो, जब सब ये कहें कुछ भी न कहो, जब सब ये कहें है वक्त
10:43बुरा, जब सब ये कहें ये वक्त नहीं बेकार की बातें करने का।
11:05प्यालों का छ्छलकना क्या कम है? जब इतना सब है कहने को, जब इतना सब है लखने को, क्या जद
11:14है के ऐसी बात करो जस बात में खत्रा जान का?
11:17जब सब ये कहें खामोश रहो जब सब ये कहें कुछ भी न कहो तब समझो पच्जर रुताई
11:25तब समझो मौसमदार का है तब सहमी सहमी रूहों को ये बात बताना लाजम है
11:33आवाज उठाना लाजम है हर कर्स चुकाना लाजम है
11:38जब सब ये कहें खामोश रहो
11:41जब सब ये कहें कुछ भी न कहो
11:43तब समझो कहना लाजम है
11:46मैं जिन्दा हूं
11:47सच जिन्दा है
11:49अलफाज अभी तक जिन्दा है
11:51अलफाज अभी तक जिन्दा है
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