- 15 minutes ago
सावन में नगर भ्रमण पर क्यों निकलते हैं बाबा महाकाल? देखें अद्भुत अविश्वसनीय अकल्पनीय
Category
🗞
NewsTranscript
00:00ओम नम शिवाया हर हर ओम नम शिवाया
00:31नगरपावन तीर्थ बन जाते हैं भक्त खुद भगवान बन जाते हैं जब महाकाल स्वयम भक्तों से मिलने आते हैं
00:42सावन के पवित्र महीने में महाकाल के अद्भुत भक्त अविश्वस्निय भक्ति अकल्पनिय द्रिश्य
01:11काल यानि समय काल यानि मृत्यू कहते हैं काल के आगे किसी के नहीं चलती
01:17तब सोचिए महाकाल के आगे किसी की क्या हैसियत
01:21नमस्कार मैं हूँ श्वेता सिंग और आज उन्हीं महाकाल के अद्भुत अविश्वस्निय अकल्पनिय संसार में आपको लिये चलते हैं
01:31क्या आप जानते हैं कि क्यूं ये मान्यता है कि कोई अधिकारी कोई मंत्री उज्जेन नगरी में रात नहीं बिता
01:37सकता
01:37क्या आप जानते हैं क्यूं भस्न से शिंगार किया जाता है महादेव का और क्यूं महाकाल की राजसी सवारी में
01:46वर्दी धारियों का अनुशासित परेड होता है
01:49अविश्वस्निय सवालों के अकल्पनिय जवाबों के साथ चलिए अध्भुत महाकाल लोग
02:18साबन के महीने में महाकाल के दर्बार में भक्ति की ये अध्भुत तस्वीर है
02:24महाकाल राजा के रूप में अपनी प्रजा का हाल जानने के लिए निकलते हैं तब पूरा शेहर ही शिवालय बन
02:29जाता है
02:32कि आजा है आके तो नगर भुवन के लिए सोया में अपने भक्तों का हाल जानने के लिए निकलते हैं
02:39भक्तों में महाकाल का रूप उतर आता है उसको जो धारन करता है वोश्य सामने आते हैं महाकाल तो समय
02:50वहीं ठहर जाता है
03:00पारह जोतिरलिंगों में महाकाल की महिमा अलग है, उनका हर रूप अलोकिक है
03:10उनकी पूजा की विशिष्ट विधि से लेकर उनके श्रंगार तक का विधान अलग है
03:22चुरा इंसानी देह का अंतिम सत्य है, वो क्यूं बना महाकाल का श्रंगार?
03:42क्यूं हर दिन की शुरुवात महादेव को भस्न के स्नान से होती है
03:59किस भस्म से कराया जाता है महादेव कुस्नान?
04:05कि धर्ती का जो अंतिम सत्य है, उसको नित्य अपने उपर धारन करते हैं, उस शेब शेक करते हैं
04:11जैसा बाबा महाकाल हाद चला देता है, वेसा बाबा महाकाल का सिंगार हो जाता है
04:15जब भगवान को भस्मर्पन होता है तब भगवान निराकार रूप में व्याप्त होते हैं
04:32क्या सचमुच कोई भी राजा कोई भी शासक उज्जैन में रात को नहीं रुख सकता
04:48क्यूं उज्जैन को ही महाकाल की धर्ती माना गया
04:52क्यूं महाकाल है उज्जैन के शाश्वत राजा
05:03क्यूं सावन के महीने में आज भी मंदर से बाहर निकलते हैं महाकाल
05:08और शान से निकलती है उनकी वो सवारी जिसमें प्रशासन के सिपाही उनकी सेवा में साथ चलते हैं
05:17महाकाल राजा शुरूप के अंदर बगत लोकों को धर्सन देते हैं ऐसा लगता है कि पालकी में साच्छात बोले नाथ
05:23विडाजमान होके निकले हो और भगत उनका विंतेजार कर रहे हैं
05:39महाकाल के सच्चे सहारे
05:46जब कुछ भी नहीं था तब शिव थे जब कुछ नहीं होगा तब शिव होंगे
05:51आज अद्भुत और विश्वसनिये और कल्पनिये में हम आपको देवाधिदेव महादेव जो आदी भी है अनंत भी जो भोले नाथ
06:01है तो रुद्र रूप भी जो काल के स्वामी है उन महाकाल के आलोक एक संसार लिये चलते
06:21राजा मंदर से निकल कर नगर भ्रमन पर निकलते हैं और जब निकलते हैं तो सारे सांसारिक पद और प्रतिष्ठाएं
06:28गौन हो जाती है
06:30श्रावन मास के हर सोमवार को प्रचंड आस्था के बीच महाकाल की सवारी उज्जैन में निकलती है
06:36और वो द्रिश्य अद्बूत होता है हम आपको महाकाल की इस सवारी में अपने साथ लिये चलते हैं
06:56जहाँ पैर रखने की जगे नहीं बच्चती वहाँ कण कण में महाकाल के प्रतिया आस्था का सैलाब उमड़ता है
07:06हर किसी को ये अनुभव होता है कि विशाल भीड में भले वो महाकाल को न देख पाए
07:12लेकिन महाकाल उन्हें देख रहे हैं उनकी आस्था को ग्रहण कर रहे हैं
07:21पंद्रा वीस साल होग है हमको बाबा के दर्शन करते करते चेतनि वीर हनुमान के यहां से देखते बाबा दर्शन
07:27देते बहुत बड़ी है
07:47महाकाल की प्रती अद्भुत आस्थाउ जैन की उर्जा है, जो लोगों की सांसों में और आचरण में वस्ती है।
07:59डमडम डमरू, जाल, मृदंग के साथ जब महाकाल की सवारी निकलती है, तो वो अद्भुत होती है।
08:07संसार में ऐसी भक्ति कहीं और नहीं मिलती।
08:11इस समय वहाँ उपस्थित हजारों लोगों के मन को पढ़ पाना मुश्किल नहीं होता।
08:16उनकी आखे, उनके भाव सब कह देते हैं।
08:28होती आनन्द आ है और बाबा तो सबको हमारे उजेन के महाकाल के राजा हैं।
08:35और हम धन्य होते हैं उनके दर्शन पाकर।
08:59कई-कई दिन पहले से महाकाल के नगर भ्रमन की तैयारियां शुरू हो जाती है।
09:04अलग-अलग लोग अलग-अलग तरे से भक्ति भाव को प्रकट करने के लिए रूप धारण करते हैं।
09:10इन्हें देखिए ये शेलेंद्र व्यास हैं।
09:13एक स्कूल के प्रिंसिपल लेकिन महादेव के प्रतिश रधा के वशिभूत ये दशकों से महाकाल की सवारी का हिस्सा बन
09:20रहे हैं।
09:21वो भी एक अलग रूप धारण करके।
09:51वो और आनंद और मस्ते के हिंदर धनुष चाय में है।
09:54महाकाल उजयन के राजा हैं।
09:57और जब इस रूप में निकलते हैं तो प्रशासन की तरफ से उन्हें सलामी दी जाती है।
10:01प्रशासन महाकाल की सवारी के व्यवस्था राजा की तरह ही करता है।
10:12ये वो भाव होता है जिसमें ये माना जाता है कि एक राजा अपनी प्रजा के बीच निकले हैं।
10:19उनका हाल चाल लेने के लिए।
10:23महाकाल की सवारी सावन में ही निकलती है और सिर्फ सोमवार के दिन ही निकलती है।
10:29पर ऐसा क्यूं होता है इसके भी कई आध्यात्मे कारण है।
10:43सावन के महीने को आध्यात्मे कूर्जा के तौर पर भवित्र माना जाता है।
10:48क्यूंकि इसमें वायू मंडल भी स्वच्च रहता है।
10:51लेकिन बारह महीनों में क्यूं सावन ही पसंद है महाकाल को इसके पीछे कई पौराणिक मान्यताएं भी हैं।
11:04अपने कंठ में जब उन्होंने विश्को धारन किया था।
11:07उनका सरीर जुवलन सीलता का प्रभाव उनके उपर अत्यादिक हुआ।
11:13जिसके कारण चंद्रमा ने उनको सांत करने के लिए उसके मस्तिक्स पे धारन हुए।
11:19परंतु फिर भी उनकी ज्वलनता सांत नहीं हुई।
11:23तब मा पारवती ने प्रार्थना की स्रिष्टी से और स्रिष्टी में जलवर्षा के प्रभाव से संपून रूप से हरियाली ब्याप्त
11:33हुई।
11:33इस हरियाली के प्रभाव से भगवान की जोलन सीलता शीग्र सांत हुई और भगवान प्रसन्न होकर प्रतेक वर्ष श्रावन मास
11:42में संपून श्रिष्टी पर केलास से निकल कर विचरन करते हैं।
11:55सोम यानी चंद्रमा, वार यानी दिवस यानी चंद्रमा का दिवस, महाकाल ने चंद्रमा को सर पर धारण किया है, जिसके
12:04कारण ये दिवस बेहत पवित्र माना जाता है, न केवल सावन में बलकी हर महीं।
12:14महाकाल की सवारी की परंपरा शुरू की थी।
12:19इसके बाद सिंद्रमा राजाओं ने इस परंपरा को और विस्तार दिया।
12:23आज भी उसी वैभाव और शान के साथ महाकाल की सवारी निकलती है।
12:29मंदिर परिसर से पालकी में आगे हाथी पर सवार होकर।
12:42महाकाल की सवारी में वैसे तो कई वाध्य यंत्रों होते हैं
12:45लेकिन डमरू का विशेश प्रयोग और महत्व होता है
12:48और इसका सीधा संबन्द महाकाल की महिमा से
12:58इंसान के मन को चंचल कहा जाता है
13:00किसी बंदर की तरा जो कभी इधर कभी उधर भंटकता है
13:03लेकिन वो डमरू की आवाज पर मदारी के इशारे परनास्ता है
13:07शिव मन को नियंचृत करने की पेड़ना देते हैं
13:10और डमरू की डम डम उसी का प्रतीक है
13:18अद्भूत पौराणिक और मद्यकालीन परंपराओं की अविश्वस्निय संगम होती है ये यात्रा
13:29हाथी, घोडे, तलवार भाज, मद्यकालीन समय का प्रतिनिध्व करते हैं
13:35तो भूत, पिशाच, गणफ, पौराणिक मानिताओं का सजीब चित्रन करते प्रतीत होते हैं
13:47और अंत में ये वो घड़ी होती है जब खुद कालों के काल महा काल निकल रहे होते हैं सड़कों
13:54पर
13:54ऐसा भी संसार में कहीं और नहीं होता
14:03नमामी शमीशानर निर्वान रूपम विभुम व्याप कम ब्रम्भ वेद स्वरूपम
14:08यानि मैं शिव भगवान को नमन करती हूँ जो निर्वान रूप हैं सर्व व्यापी हैं ब्रम्भ और वेद स्वरूप हैं
14:15शिव रुद्राष्ट कम की रचना गोस्वामी तुलसिदास ने की थी जिसमें भगवान शिव के अलग-अलग रूप और गुण का
14:23वर्णन है इन्ही रूपों में है उनका महाकाल रूप
14:27महादेव महाकालेश्वर के रूप में उजयन मेवास करते हैं यूँ तो शिव जी की उपासना कई तरह से की जाती
14:36है लेकिन महाकालेश्वर में भस्म आरती की अद्भूत परंपरा है
15:04कि जो विश्व के विश्वनात वो यहां रुद्र है
15:17जो संसार में महादेव वो यहां प्रलेयंकारी है जिन्हें दुनिया शिव शंकर के रूप में पूजती है
15:26वो यहां प्रचंड है काल के भी काल महाकाल है
15:38रात्री के तीसरे पहर जब पूरी दुनिया सो रही होती है तब वो जैन में महाकाल की नगरी जाती है
15:48यह वो समय होता है जब ब्रह्म मुहूर्त में ब्रह्मांड की सकरात्मक उर्जा सर्वाधिक सक्रिय होती है
15:57इसी पवित्र समय में पट खुलते हैं महाकाल के
16:04और प्रारंब होती है महाकाल के अध्भुट श्रिंगार के साथ भस मारती
16:11महाकाल को पहले पवित्र गंगाजल से स्नान कराया जाता है
16:15फिर दूद, दही, घी, शहेज, शक्कर से स्नान संपन्न होता है
16:45स्नान के पश्चात प्रारंब होती है महादेव के रूप श्रिंगार की प्रक्रिया
16:50प्रति दिन महादेव को एक नया रूप धारण कराया जाता है
17:06और इसकी भी एक अद्भूत माननेता है
17:11प्रतिया निराकार और साकार दोनों रूप है इसलिए बाबा महाकार निराकार से साकार रूप धारण करते हैं
17:23तो जब संकर बनते हैं तो बाबा महाकार के अलग अलग सरूप हमें सिंगार किये जाते हैं
17:47यह माना जाता है कि महाकार के प्रतिदिन परिवर्तित होने रूप स्रिष्टी के चक्र में निरंतर होने वाले परिवर्तन के
17:55प्रतीक होते हैं
17:57आमधारणा ये भी है कि महाकाल अपने भक्तों को अलग-अलग रूपों में दर्शन देते हैं
18:02और हर रूप के साथ एक अलग संदेश और आशीरवाद होता है
18:06जिसे महाशिवरात्री में महाकाल का श्रिंगार दूले के रूप में किया जाता है
18:11जबकि सावन के महीने में राजा धिराज की तरह है और दोनों का अर्थ और महत्व अलग-अलग है
18:19जब पुजारी सिंगार करने के लिए चालू करता है तो उसके मन में जो भगवान भाव दे देता है
18:24वही भाव सिंगार के अंदर आ जाते हैं कभी राजा के रूप में आ जाते हैं कभी हनिवान जी के
18:29रूप में आ जाते हैं
18:30कभी योगी के रूप में आ जाते हैं कभी भगवान शिव के साथ में माता पारवती विराजमान हो जाती है
18:35ये उस समय जो पहुना आती है उसी पर बाबा का सिंगार चालू हो जाता है
18:40पेले से किसी परकार का इसमें यह नहीं रेता है कि आज हम जाकर यह बनाएंगे
18:44या यह सुरूप होगा बाबा का क्यों बहुत सुरूप होगा
18:49महाकाल जब रूप धारण कर लेते हैं फिर शुरू होती है भस्म आरती
19:01आखिर क्यूं होती है महाकाल की भस्म से आरती
19:04सिर्फ उजयन जोतिरलिंग में ही क्यूं होती है भस्म आरती
19:08यह भस्म आरती होती है या भस्म से महाकाल का प्रथम स्नान
19:13भस्म आर्ती में प्रयोग होने वाली राक कहां से आती है?
19:18क्या चिता की राक से महाकाल की भस्म आर्ती की जाती है?
19:22और जैसी की मानिता है, क्यूं महलाओं को भस्म आर्ती देखना वर्जित है?
19:35महाकाल शम्शान वासी है
19:37महाकाल की आर्दी जब भस्म से की जाती है
19:40तो ये संदेश होता है संसार की लश्वर्ता का
19:43और देह के राख से अंतिम संबंध का
19:52बित्यु के देवता होने के नाते
19:54अगर हम देखे ए तो इस चराचेर ब्रह्मान्ड का अंतिम सत्य क्या है.
19:59कोई भी वस्तू हो, कोई भी वềवस्ता हो, उसकी अंतिम गती क्या होती है.
20:03बस महोना है, जो अंतिम सत्य है, उसको जो धारण करता है, वो शिवा है.
20:22महादेव के उपासना में अभिशेक का महत्व बड़ा होता है
20:26इस शब्द को इस संदर्ब में देखें तो मतलब होता है पवित्र जल से स्नान कराना
20:31पौरानिक कथा ये है कि समुद्र मंथन के समय जो विश निकला उसे भगवान शिव ने ग्रहन किया था
20:37जिससे उनका शरीर गर्म हो गया उस जलन को दूर करने के लिए तब देवताओं और दानवों ने मिलकर उनका
20:45अभिशेक किया
20:46तब से अलग-अलग सामगरी से उनके अभिशेक की परंपरा है
20:50जैसे तो अलग-अलग जोतिर लिंगो में अभिशेक की विधी एक समान रहती है
20:55पर केवल महाकालेश्वर की भस्म सनान या भस्म आरती की परंपरा है
21:07बारज-योतिर लिंगो में कीवल उज्जैन में ही महादेव महाकाल रूप में विराजमान है
21:12और इसके पीछे पोरानिक मान्यता है
21:18भगवती महासति को जो लेकर के भगवान महाकालेश्वर जो शिजी चले थे
21:24तो उज्जेन अवंतिका जो है अवंतिका नगरी में आकर के भगवती को महा सती जो है वो पूर्ण रूप से
21:32भस्म जो स्थाक्षात मतलब भस्म के रूप में हो गई थी और भस्म रूप में भगवान शिव जी ने महाकाल
21:39को वो भस्म लेकर के भगवती सती का जो है अपने म
21:53अच्छा के लिए बाबा यहां पर प्रगट हुए थे, काफी आक्रोशित भाव से प्रगट हुए थे कि ये चोटे बच्चों
21:58का वद करने जा रहा है, तो इसलिए फिर हुकार भरी और काल रूप में प्रगट हुए और उसका वद
22:04किया और फिर यहां पर वो भगवन महाकाल
22:13के रूप में अस्थापित हो गए।
22:36भक लेते हैं, इसी कारण से इसे मंगला आरती भी कहा जाता है।
23:06में अखंड ब्रह्मचारियों या साधो संतों की चिता की राक से महाकाल की भस्म आरती होती थी।
23:13लेकिन समय के साथ भगवान की आरती के लिए मनुश्यों की चिता की राक का प्रयोग अतारकिक लगने लगा, इसे
23:20रोक दिया गया।
23:22अब जिस राक का प्रयोग होता है उसे पीपल, शमी, पलाश, बरगद, अमलताश, बेर के पेड़ों की लकडी और कपिला
23:30गाय के कंडों को जला कर प्राप्त किया जाता है।
24:02इसे लौकिक भस्म भी कहा जाता है।
24:03मानिता ये है कि महाकाल स्नान के समय दिगंबर रूप में होते हैं और उन्हें उस रूप में महिलाओं को
24:10देखना उचित नहीं माना जाता।
24:12दूसरे ये भी विवस्ता है कि महाकाल के स्नान, श्रिंगार और भस्म आरती के समय अधो वस्तर ही पहना जाता
24:19है यानि सिर्फ कमर से नीचे बिना सिला वस्तर।
24:22यही कारण है कि पुजारी केवल धोती धारन करते हैं भस्म आरती के समय जब भगवान को भस्म आरती होता
24:45है तब भगवान निराकार रूप में व्याप्त होते हैं।
24:49उस समय महिलाओं को उस स्वरूप का दर्शन निशेत किया गया है भस्म चड़ते समय मंदिर प्रांगण में भी यही
24:57कहा जाता है कि महिलाएं अपना घूंगट अत्वा पटधारन करें जिस से उस निराकार स्वरूप को ना देखें परन्तु भस्म
25:08आरती एवं प्राता मं
25:10अंगला आरती के दर्शन महिलाएं कर सकती हैं
25:27भस्म यानि अंत और अंत यानि मृत्यू और जब अंत की प्रतीक ये भस्म महाकाल का श्रिंगार बनती है तो
25:35ये केवल उनकी अराधना नहीं मृत्यू का उत्सब बन जाता है
25:54शिव आदी यानि प्रारंब भी है और अंत यानि समापन भी है
25:59भस्म आरती आदी से अंत तक की ऐसी अध्भुत्यात्रा है जो धर्ती पर कहीं और देखने को नहीं मिलती है
26:09कर दो खत्सब आदी यानि था राधना नहीं मिलती है
26:44आस्था श्रद्धा और भक्ति के भाव के अलावा महाकाल एक ऐसे रहस्य के और भी अनादिकाल से संकेत दे रहे
26:52हैं जो अद्भुत अविश्वस्निय अकल्पनिय है
26:55महाकाल को उजैन का शाश्वत राजा माना जाता है उनके समक्ष किसी के नहीं चलती
27:01यहां से जुड़ता है एक और मानिता का सिरा जिस कारण कहते हैं कि सदियों सदियों से सत्ता की किसी
27:08भी नुमाइंदे ने महाकाल की नगरी में रात नहीं बिताई
27:12पर क्या वाकई
27:21क्यूं कहा जाता है कि महाकाल की नगरी में कोई राजा या शासक रात्री विश्राम नहीं कर सकता
27:28इस मानिता के पीछे क्या कारण है कि अगर कोई राजा कोई मंत्री उज्जैन नगरी में रात को रुका
27:35तो या तो उसकी सत्ता चली जाएगी या उसकी अखाल रिध्य हो जाएगी
27:47उजैन में महाकाल ही राजा है और इसलिए सदियों पुरानी मानिता है
27:52कि कोई भी यहां राजा की हैसियत से रात को नहीं रुख सकता
27:59क्या सचमुच में यहाँ पर कोई भी राजा रात्री विश्राम नहीं कर सकता है
28:26इस व्यवस्ता को समाप्त की कि राजा कोई भी व्यक्ति रहे गादी खाली रहेगी केवल राजी के रूप में उसका
28:38नाम से लेगा और राजा विक्रम की गादी के नाम से गादी होगी तो यहाँ विक्रम सम्वत भी चलता है
28:43और विक्रम को भी माना गया और विक्रम ने इस �
28:46को बंद किया लेकिन आज भी यह प्रथा है कि अवंति का उज्जेन के अंदर केवल राजा है तो वह
28:53माकाल
28:54ये परंपरा इस हद तक निभाई जाती है कि उज्जेन नगर निगम क्षेत्र में कोई भी प्रथान मंत्री मुख्य मंत्री
29:02यहां तक की डीम नहीं रुके
29:05लेकिन मौजूदा मुख्य मंत्री मोहन यादव ने इस परंपरा को बदला
29:16जब डॉक्टर बोहन यादव यहां पर आए हैं जो कि यहीं करेने वाले हैं लोग यहां पर थोड़ा सा उच्छायत
29:21होकर आपको घेर भी लेते हैं मुझे लगता है कि सबसे परिचाय आपका होगा नाम नाम से उज्जेन में छोटे
29:27से बड़े हुए और इंदर उज्जेन
29:40मोहन यादव उज्जेन के ही रहने वाले हैं और उनका घर नगर निगम क्षेत्र में पड़ता है मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री
29:48बनने के बाद जब वो उज्जेन गए तो उन्होंने इस परंपरा को तोड़ा और इसका बेहत दिल्चस्प कारण उन्होंने बताया
29:57देखे हम सब बाबा महाकाल के एक तरसे पुत्रवत हैं उनकी संतान है और बाबा सब पे करपा करते हैं
30:04और ये सुभागी की बात है कि मैं तो यही निवास करता हूं तो सुभाई ग्रूप से मैं समझनी सकता
30:11हूं कि इसमें कोई गलत बात है और आतीत के काल में भी ऐसे ज�
30:24आजन प्रसाजी आ रहे हैं बाद में भी लोग रहें तो मैं तो उसी सिलसले में और हम तो मुख्य
30:30सेवक हैं और बाबा करपा करेंगे
30:34तो क्या ये वाकई मिथक है क्या कभी किसी शासक की चतुराई के कारण ये मान्यता बनी या फिर इसे
30:43किसी और रूप में समझना होगा हमने इसे समझने का प्रयास किया
30:51परिधी और उज्यन की बढ़ी भी हो सकती है नगर निगम के साब से लेकिन हमारी महाकाल की और अध्याक्मिक
30:58द्रश्टि से हमारे भगवान महाकाल का जो ध्वज होता जो शिकर के उपर उसकी जहां तक परच्छे जाती है उसको
31:05हम भगवान महाकाल की परिधी मानते हैं उस �
31:08के अंदर कोई राजा नहीं रहेगा और रहेगा तो हुसका नुकसान निश्चित होता यह कि एक सुंदर
31:15सोच है कि महाकाल की ध्वज पता का ही उज्जेन का शासन है यानि जहां तक ध्वज की छाया वहाँ
31:23तक महाकाल की राजसी माया क्योंकि महाकाल केवल उज्जैन नहीं स्रिष्टी के नियनता है
31:32श्री महाकालेश्वर मंदिर की महिमा प्राचीन काल से चली आ रही है
31:36यहाँ पर महाकाल में काल के अर्थ को भी समझना आवश्चक है
31:40काल का अर्थ होता है समय
31:42काल का अर्थ मृत्यू भी है
31:44कालों के काल है महाकाल
31:47पर वो उज्जैन में ही क्यों स्थापित है
31:49उज्जैन के ही राजा महाकाल को क्यों माना जाता है
32:01उज्जैन यानि वो अद्भुद्धर्ती जहां स्वयम प्रकट हुए महाकाल
32:09हमारे यहां 24 तत्तों की चर्चा की गई है और उसमें मूल जो दो तत्तों दर्शाये गए हैं वो प्रकृति
32:16और पुरुष है
32:16प्रकृति वो है जिसे हम देख सकते हैं जो एक बिस्तारवादी है जो फैलाव करती है उसे हम प्रकृति कहते
32:23हैं
32:23और जो परम चेतना है उसे हम पुरुष कहते हैं कि यहां केंद्र में भगवान उस पुरुष तत्त को एक
32:31लिंग के रूप में एक पिंड के रूप में अस्थाफिट किया गया और उसके चारो तरफ जेलेरी है जेलेरी गौर
32:37आप ध्यान से देखेंगे तो उत्तर की तरफ से
32:39जेलेरी का प्रारम होता है जो कि बहुत पतला होता है सुरूप और जैसे जैसे दक्षिन की यात्रा करती हो
32:44विस्तार करते हुए आगे चली जाती है और एक अवस्था में आकर के दक्षिन की तरफ व्याशाकार होकर के अस्तित्तिहीन
32:51हो जाती है
32:57उजयन यानि वो धर्ती जो पृत्वी की नाभी मानी गई जहां से दुनिया का विज्ञान और गणनाय चलती रही
33:10उजयन को पृत्वी के नाभी नेवल ओफ दी अर्थ क्यों कहा जागा देखें क्या है कि उजयन का प्राचीन समय
33:17पर जो महत्तु था
33:19वो खगोली गणना के साथ से काफी महत्पून था महत्पून के से साथ से था एक तो उजयन करकरेखा पर
33:25उस समय इस्थिती थी अभी थोड़ा सा परिव्यतन हो गया है और दूफरी बात क्या है कि जो समय की
33:31गणना होती थी जो जीरो देशांतर जो अभी ग्रिन विच को मानत
33:34है या भारत के लिए सालेव यासी डिग्री का मानते हैं उस समय उजयन के देशांतर को जीरो मान के
33:40समय की गणना होती थी महत्पून रहता है कि अगर करकरेखा परिफ्थे थे तो इसका मतलब क्या है जब हम
33:46आकास में अब्जर्वेशन करते हैं तो अब्जर्वेशन एकद
34:04Brendan perpendicular सर के उपर कर पाएंगे तो जितना observation हम perpendicular करेंगे उतना error की समावनाव कम रहती है
34:13अगर कोई angle होगा error की समावना जाधा रहती है गर्ना एक गलत होंगी तो इफली वे ओजयन को प्राचίν
34:19समय से खगोल का महत्पूंट के इंद के रूप में विक्सेत है
34:30उजयन यानि वो धर्ती जहां से समय अपनी गती तै करके चलना शुरू करता है
34:52उजयन का कण अध्भूत है उजयन का चपपा चपपा अकल्प निया है अध्भूत है कि दुनिया में जब समय को
35:07मानने का कोई एक तै नियम नहीं था तब से उजयन दुनिया को सटीक समय बता रहा है
35:16निश्चित रूफ से उज्जेन प्राचीन समय में कालगाड़ना की महतपूर्ण अगरी रही है।
35:43सवाई राज़ा जैसिंधुती द्वारा किया गया है। अन्होंने बनाई है। इसके बाद दिल्ली जैपूर मत्रा बना रही है।
36:13विक्रम समवच शुरू किया इसमें दिन, सप्ता और महीने की गणना सूर्य और चंद्रमा की गति के आधार पर की
36:20गए जो आज भी भारत की मान्य परंपरा है
36:23मान्यता है कि विक्रमा दित्ती ने भी एक वेदशाला बनाई थी जिसने उजयन को विश्व में जोतिश के प्रमुख शहर
36:28के तौर पर स्थापित किया
37:02समय की गणना से जुड़ा उजयन का इतिहास और प्रित्वी पर उजयन जिस जगे स्थित है
37:08समझ में आता है कि यही वो कारण हो कि महादेव उजयन की भूमी पर महाकाल के रूप में स्थापित
37:14है
37:18महाकाल शिवलिंग दक्षण मुखी है और ऐसा कोई शिवलिंग नहीं पाया जाता
37:23उजयन में महाकाल का दक्षण मुखी होना कोई सयोग नहीं है बलकि सनातन धर्म की ऐसी व्यवस्ता है
37:29जो आदिकाल से चलिया रही है और इसका सीधा संबंध महाकाल की महमास है
37:38पुजयन में महाकाल जोतिरलिंग की द्रिष्टी दक्षिन दिशा की ओर होती
37:42और सेनातन मान्यताओं में दक्षिन दिशा मृत्यू के देवता यमराज की मानी जाती
37:48अब अगर मान्यताओं का गूर अर्थ समझें तो समझना मुश्किल नहीं
37:53कि कालूं के काल महा काल यम्राज की ओर दुरिश्टी रखे हुए
37:57और जो भग महा काल के समख शर्जी लगाते हैं
38:01उसका क्या प्रभाव रहता होगा
38:04दक्षिन दिशा जो है वो काल की दिशा है और कोई भी व्यक्ति काल की दिशा में कोई शुप काम
38:11करना नी चाहता है उसको भाई होता है मरत्यु भाई होता अन्य भाई होता है इसलिए उसको दक्षिन तो भगवान
38:18स्वयम शिव जो महाकाल है कालों के काल है यहने कि मरत्यु क
38:22के उपर भी यदि किसी ने विजय प्राप्ते की है तो केवल शिव ने की है महाकाल की जो दक्षिन
38:27तरब मूख है वह इसलिए भी है कि काल का नियंत्रन काल यदि अपनी सिमा छोड़ दे तो प्रलाई प्रलाई
38:35है तो उसके उपर नियंत्रन रखना भगवान महाकाल उसके उ�
38:54लिए उजयन में महाकाल का शासन है उन्हीं की सर्था चलती है लिहाजा ये भी माना जाता है कि जो
39:01उनकी शरण में आ चुका होता है उसकी मृत्यू और मोक्ष दोनों का निर्णे महाकाल लेते हैं और यम्राज को
39:08उसका अनुपालन करना होता है
39:12जो भी बाबा बाबा महाकाल का दर्शन करता है तो उसकी अकाल मृत्यू नहीं होती है उसकी पीछे जो एक
39:18भाव है और चुकि हमारे हाँ परंपरा रही है हमारे घरों में पहले पूरवज कहा करते थे कि दक्षिन की
39:25तरफ पैर करके नहीं सोना चीए हमारे हाँ दो पोल है न
39:40होएंगे तो नकारात्म कुर्जा हमारे अंदर प्रवेश करेगी इसलिए कहते थे कि उत्तर की तरफ पैर करके सोना चीए ताकि
39:45सकारात्म कुर्जा मिले और दूसरी दिश्टिकोंड से कर हम कहें तो दक्षिन की देशा जो है मृत्यू की दिशा मानी
39:51गई है भगवान महाक
40:07महाकाल की जागरतूर्जा को लेकर ये मानेता है कि जब तक खुद महाकाल का बुलावा न हो कोई महाकाल के
40:13दर्शन नहीं कर सकता लेकिन जिसको दर्शन मिल जाता है वो अकाल मृत्यू के भय से मुप्त हो जाता है
40:24महाकाल अकाल मृत्यू से रक्षा करते हैं
40:27इसको लेकर कई प्राचीन और पौराणिक कथाएं हैं
40:31और इनी में से एक कथा मृत्यू के संकट को टालने वाले महा मृत्यून्जय मंत्र से जुड़ती है
41:00सनातन माननेता है कि जब किसी पर मृत्यू का संकट चाता है
41:03तो उसे महा मृत्यून्जय मंत्र के जाब की सलाह दी जाती है
41:08मिरकंड रिशी ने भगवान सिव से अराधना की कि उन्हें एक दिव्य और बुद्धिमान पुत्र की प्राप्ती हो
41:19इससे भगवान सिव प्रसन्न होकर उन्हें वर्दान दिया कि उन्हें एक दिव्य बालक की प्राप्ती होगी
41:28उसके उपरान आकास वानी भी साथ में हुई कि उस बालक की आयू केवल मात्र 16 वर्ष ही रहेगी
41:38इससे रिशी रिशी पत्नी चिंतित हुए जब बालक 14 वर्ष की आयू में आया तो माता की चिंता का कारण
41:46पूछा
41:47तब मारकंडे रिशी ने भगवान सीव की अरादना की और महा मृत्तुंजे के जब से अपनी मृत्यू को बस में
41:56किया
41:56जब यम्राज उन्हें उनके प्राण हरने को आए तब उन्होंने भगवान सीव के उस महामिर्तुंजे जब के प्रभाव से भगवान
42:07सीव प्रगट हुए और उन्होंने यम्राज को क्रोधित होकर वहां से भगाया और उन्हें अजर अमर होने का आशिर्वात प्रदान
42:16किया
42:19शिव पुराण और मारकंडे पुराण के अनुसार महाकाल का आशीरवाद प्राप्त होने के बाद
42:25रिशी मारकंडे अमरत्व को प्राप्त हुए और अश्ट चिरन जीवियों में उनकी गणना होती है
42:34महाकाल के दर्बार में आने वाले शद्धालू जीवन की विशमताओं से मुक्ति की कामना करते हैं
42:40और ये क्रम सदियों से अनुवरत जारी है
42:49जितनी भी अद्भूत बाते हम अपने आसपास देखते हैं
42:53उनका एक अविश्वस्निय स्वरूप होता है और एक अकल्पनिय सच भी
42:59अद्भूत अविश्वस्निय अकल्पनिय में आज के लिए इतना ही
43:03क्यामर पॉस्न अमित बद्वार के साथ मुझे दीजिये इजासत
43:07देश और दुनिया की बाकी खबरों के लिए आप देखते रहे आज तक
Comments