00:00मैं छोटा था, जाते थे ननिहाल, वहां मुझसे भी छोटे छोटे, बड़ी तुलसी लगी हुई थी है हमारे घर में,
00:08जिन्होंने देखा हो तुलसी का पौधा थोड़ा सा बड़ा हो गया, वो जानते हैं कि उसके आसपास बहुत सारे छोटे
00:14छोटे प्यादा होने शुरू
00:27रह जाएं, तो कहें कुछ गडबड लग रही है, यह लगता है नीचे इसकी जड़ में, उसको उखाड करके चेक
00:32करें कि जड़ ठीक है, फिर वापस लगा दे, मा प्रक्रती, बीज प्रक्रती, मिट्टी प्रक्रती, पानी प्रक्रती, हवा प्रक्रती, सूर्य
00:42प्रक्रती,
00:43और छोटू लाल को क्या लग रहा था इस पौधे को बढ़ा करने का काम मेरा है अब मैं ना
00:52करूं तो कैसे बढ़ा होगा और जिस जिसको वो हाथ लगा दे वो समझ ही ना आए बलकि जो उनके
01:02इस पर्ष से बच गए वो बढ़ते जा रहे हैं जिन जिन की ज़्यादा सेवा ट
01:13तुलसी के जिस पौधे को छूओगे वो मरेगा और वो बचे रह जाएंगे जिनको तुम छूने नहीं पाए ये इतने
01:21बड़े बड़े जंगल तुमने जाकर रिक्षार उपन करा है बोलो और जब भी इनसान में जंगलों को छूआए तो क्या
01:29करा है
01:32जंगल खड़ा ही वही होता है जहां इनसान का स्पर्श नहीं अभी और कई बार हम जंगल काटने वगरा के
01:38बाद ये भी कहते हैं कि अब हम भरपाई कर देंगे कुछ हम लगा देंगे अपनी ओर से
01:43वो सब नकली जंगल होते हैं इतनी अजीब बात है इनसान शहर बसा सकता है जंगल नहीं बसा सकता
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