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00:00कोहम था मेरा पाला हुआ कुट्ता मेरे सामने आया था इतना बड़ा भी बीमार हुआ था छे महीने आठ महीने
00:07उसकी दवा भी चली चला गया कितना रोक हो गया किसको रोक हो गया ये तब कह रहा हूँ जब
00:13कोहम की जितनी दवा हो सकती थी वो की गई बिल्कुल नियमित रू
00:29के बाद जीवन को ऐसे मुठी बांथ के पकड़े रहना शोभा नहीं देता जैन मुनी इस मामले में बड़ा उचा
00:38आदर्श प्रस्तुत करते हैं उनको जब दिखाई दे जाता है कि अब ये शरीर चलने वाला नहीं तो खाना पीना
00:45छोड़ देते हैं वो कहते हैं घिसट-घि
00:48किछ सटके क्या जीना अब विदाई का वरक्त आ गया हम गरिमा के साथ विदाई लेंगे जीवन का विरोधी हो
00:54करके यो अमृत्योका समर्थक
01:10आता ही है जब तक काया है जब तक चित्त चैतन्य है जीवन का सदुपयोग कर लो
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