00:00अच्राटो सांद कोई भजन गाते हैं?
00:01खूब गाते हैं, भजन ही भजन गाते हैं, आप हमारी गीता कम्यूनिटी में आईए, वहाँ भजन ही भजन चलते हैं
00:07हमारा यार है हमने!
00:13अरे अद्वयत में कैसे भजन नहीं होगे? आदे शंकरा जा रहें भजगो विंदम, भजगो विंदम कर रहे थे, आप कहा
00:18रहें अद्वयत में भजन नहीं है?
00:19लेकिन लेकिन भजने का बड़ा साफ, सपष्ट और सुन्दर अर्थ होना चाहिए
00:25भजने का मतलब तोते की तरह दोराना नहीं होता
00:28भज शब्द का अर्थ होता है दूरी
00:32देखना कि मैं जो बना बैठा हूँ, मैं वो नहीं हूँ जो मैं सचमुच हूँ
00:38एक दूरी दिख रही है मुझे, मेरे तथ्थे में और मेरी संभावना में
00:44और ये दूरी कष्ट देती है, इसी कष्ट से सब भजन उठते हैं, उसको भजन बोलते हैं
00:50भजन बिना ग्यान के नहीं उठ सकता, दस लोग कुछ गा रहे हैं तो आप भी वहीं पर मस्थो करके
00:56गाने लग गए इसको भजन नहीं बोलते
00:58जो गा रहे हैं उसका अर्थ भी नहीं पता ठीक से, बस दोहराए जा रहे हैं, दोहराए जा रहे हैं,
01:03नाचे जा रहे हैं, इसको भजन नहीं बोलते
01:05भजने के लिए सबसे पहले घोर पीड़ा उठनी चाहिए, वो विरह ही प्रेम का आधार है
01:15गाड़ी, मकान और इज़त के पीछे भागते भागते, मैं अपनी ही जिन्दगी से ठक चुका हूँ, अब मुझे अंधी दौर
01:21नहीं, सच में एक आजाद जीवन जीना है
01:24भज, भज, देखना कि ये मैं कहां आगरगे पड़ गया हूँ, मैं कौन हूँ और अपने आपको क्या माने बैठा
01:30हूँ
01:30क्या मेरी सच्चाई है और कैसा मैं जीवन जी रहा हूँ, कितनी दूरी हो गई इन दोनों में, कितना भेध
01:36हो गया इन दोनों में
01:37जब ये देखाई देता है, तो फिर उससे स्वता ही भजन फूटता है, वो आशों के साथ फूटता है फिर
01:44भजन, तो वो असली भजन होता है, ये जो आप आम तोर पे भजन अजन देखते हैं, ये सब ऐसे
01:48ही है, ये तो मनोरंजन है, भजन नहीं है
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