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  • 6 hours ago
पीढ़ियों से, बांस को हाथ से आकार देने की लयबद्ध आवाज पूरे असम के गांवों में गूंजती रही है. कुशल कारीगरों ने इस घास को सुंदर, व्यावहारिक और अलग-अलग तरह के पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों में बदल दिया है. अब, इस सदियों पुरानी परंपरा को व्यापक मान्यता मिल रही है. असम की समृद्ध विरासत को एक बड़ा बढ़ावा देते हुए, बाह सिल्पा के नाम से जाने जाने वाले राज्य के स्वदेशी बांस शिल्प को प्रतिष्ठित भौगोलिक संकेत यानी जीआई टैग दिया गया है. कारीगरों का कहना है कि जीआई टैग उद्योग को बढ़ावा देगा, बाजार के अवसरों का विस्तार करेगा और पारंपरिक शिल्प कौशल को संरक्षित करेगा.  15 जून को 'बाह सिल्पा', पारंपरिक वाद्ययंत्र 'बिहू पेपा' और कार्बी आंगलोंग और देओरी हैंडलूम उत्पादों को भी जीआई टैग मिला है. इससे राज्य की सांस्कृतिक और कारीगरी से जुड़ी समृद्ध विरासत और परंपरा उजागर हुई.

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00:01पीडियों से बास को हाथ से आकार देने की लैबद आवाज पूरे असम के गाउं में गूंचती रही है।
00:07कुशल कारीगरों ने इस घास को सुन्दर, व्याभारिक और अलग-अलग तरह के पर्यावरन अनुकुल उत्पादों में बदल दिया है।
00:17अब इस सदियों पुरानी परंपरा को व्यापक मानिता मिल रही है।
00:21असम की समर्द विरासत को एक बड़ा बढ़ावा देते हुए बहा सिल्पा के नाम से जाने जाने वाले राज्जी के
00:29सुदेशी बांश शिल्प को प्रतिष्टित भौगवलिक संकेत यानि जी आई टैग दिया गया है।
00:34कारीगरों का कहना है कि जी आई टैग उद्ध्योक को बढ़ावा देगा, बाजार के अवसरों का विस्तार करेगा और पारंपरिक
00:43शिल्प कोशल को संरक्षित करेगा।
01:06कारीगर काम करते हैं, हम लोग उनके लिए पर अच्छा रहेगा।
01:11हम लोग का फैमिली बीजनेस है, हम लोग 12 माही ने से काम करवाते हैं, कुछ भी चीज़ अगर भास
01:21और बेच से बनावा चीज़ कुछ भी हम लोग प्रवाइट कर से हैं।
01:2415 जून को बहसिलपा, पारंपरिक वाद्यांत विहुपेपा और कार्वी अगलोंग और देवरी हैंडलूम उत्पादों को भी जी आई टैग मिला
01:33है।
01:34इससे राज की सांसक्रतिक और कारीगरी से जुड़ी सम्रद विरासत और परंपरा उजागर हुई।
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