00:00अपमान क्यों नहीं अनुभव होता जब हाथ फैला करके कहना पड़ता है कि शॉपिंग जा रही हूँ पैसे दे दो
00:05मुझे शॉपिंग के लिए पैसे चाहिए
00:08पिछले मैंनी तो दिये थे ना
00:09क्यों नहीं अपमान अनुभव होता
00:12इसे अपना अधिकार मान ही कैसे लिया
00:14कि उसके पैसे पर मेरा भी तो हक है
00:16कैसे हक है उसने कमाया है उसका है
00:18और उसने कैसे मान लिया कि उसकी देहें पर मेरा हक है
00:21उसकी देहें उसका अधिकार क्षेत्र है
00:23तुमारा हक कैसे हो गया उस पर
00:26ना पती के पैसो पर पत्नी का हक है ना पत्नी की देह पर पत्नी का हक है
00:30ये रिष्टा कैसा है जिसमें एक दूसरे से कहा जा रहा है मैंने तेरे ले ये किया है तू मेरे
00:35ले अब ये कर
00:35मैंने तेरे लिए ये किया है, तू मेरे लेकर ही कैसा रिष्टा है। ये प्रेम तो नहीं है।
00:40मैं आपसे हाथ उठाने को कहूँगा नहीं। पर भीतर ही भीतर उठा लीजिएगा।
00:45अपमाने तुम हैसूस किया है कि नहीं।
00:49बोलिए।
00:51उपर उपर से कितना भी प्रपंच किया जाए
00:55आते हैं वो ख्षण के नहीं जब रिष्टे की हकीकत बिल्कुल नंगी सामने खड़ी हो जाती है
01:00बोलो रिष्टा जरूर होना चाहिए पर रिष्टा व्यापार का हो ये जरूरी है क्या
01:08पूछ रहा हूँ
01:09प्रेमन बाड़ी उपजे प्रेमन हाट बिकाए
01:13खरीदे बेचे जाने वाली चीज नहीं है प्रेम राजा प्रजा जेहिर उचे
01:20शीश काट लेई जाए
01:22जब दो पक्षियों में दोस्ती इसलिए होती है कि सास और उचा उड़ पाएंगे
01:28उसे प्रेम कहते है
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