00:00तुम रिष्टा भी कहते हो
00:05ओके येस
00:07अरे ये चीजे ऐसी होती है जो सहज बनती है
00:10ये चीज खुबसूरत तभी होती है जब तुम्हें पता भी न चले और बन जाए
00:14लेकिन तुम रिष्टा बनाते हो ठपपा लागे
00:17क्याते हो कल तक हो गल्फ्रेंड नहीं थी आज हो मेरी गल्फ्रेंड हो गई है क्यों मैंने ठपपा लगा दिया
00:22और यसे फिर जब डिसकॉंटिनिटी आती है तुम्हारी तो वो भी सडेन होती है अब डिसकॉंटिनोस हो गए
00:26कल तक हमारा रिष्टा था, आज हमारा रिष्टा नहीं है
00:30यह कौन सा रिष्टा है जो सडेनली टूट सकता है
00:34तुम्हारी समस्या बताऊं क्या है
00:36तुम्हारे चीवर में कुछ भी सहज नहीं है
00:38दो कैदी साथ तो रह सकते हैं जैसे किसी जेल में
00:43पर प्यार तो आपस में दो आजाद पंची ही कर सकते हैं
00:47जहां आजाद ही नहीं है वहाँ प्यार नहीं हो सकता, साथ हो सकता है
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