00:02नमस्कार, मैं श्वेता तिवारी आप सभी का आभिननन करती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रिगा के प्रधान संपादक,
00:10विद्या वाचसपती गुलाब कुठारी जी का शरीर ही ब्रह्मान श्रिंखला में पत्रिगायन में व्रकाशित आलेक, ज
00:29माया ने तो जीव को इतना बांध दिया, बिन्न बिन्न इंद्रियों के विश्यों के साथ, इतनी चकाचौंध के साथ कि
00:37वह माया के चक्कर में अपना स्वरूप ही भूल बैठा है, माया ने तो स्वयन ब्रह्म को पिज्रे में बंद
00:43करके लाचार बना दिया है, केवन मान�
01:26This is the dream of the world.
01:27I love the music
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02:18उसके बंधन से उसकी मर्जी की बिना नहीं जूट सकते, तब साधारण जीव की तो क्या ताकत है?
02:23कृष्ण स्वयम कह रहे हैं, देवी येशा गुण मई मम माया दुरत्यया मामेव ये प्रपध्यनते माया मेता दर्मते।
02:32यह मेरी त्रिगुण मई माया बड़ी दुस्तर हैं, जो मुझको ही भस्ते हैं वे इसको पार कर जाते हैं, माया
02:39अज्यान है, भटकाव है, मिथ्या दृष्टी हैं, वेदान्त में भगवान की बाहिय शक्ती हैं, जो निर्गुण ब्रह्म को सगुण जगत
02:47का रूप देती है
02:48इसका मुख्यकार्य जीव को भगवान से विमुख करके संसार में बांधना ہے, माया को ब्रह्म की कामना भी कहते हैं,
02:56वही ब्रह्म को विभिन रूपों में प्रकट करती हैं, इसी का शक्ती रूप महामाया कहा जाता है, जो की सूख्षव
03:03में शरीर में कार्य करता है
03:04अपनी इच्छा से ही जगत की रचना करती है या त्रिगुनात्मक भढ के संपूर्ण रिश्टी को बांध कर रखती है
03:12जबकि योग माया इश्वर की आन्तरिक शक्ती है
03:15महा माया इश्वर से विमिक्ष करती है और योग माया जोडती है
03:19योग माया निर्गुन और सत्व मई है, योग माया इश्वर के एश्वर्य को ढख देती है, यह प्रेन की गहनता
03:27के लिए है, मोह नहीं है, भक्तों को जोड़े रखना है, जब चेतना इस्थोल से उठकर सूख्ष्म भाव जगत में
03:34प्रवीश करती है, तब महा माया का आवर
03:48बदलने लगते हैं, मन यदी वस्तु इस्थिति को जान ले, उसका वास्तविज्ञान होना ही, माया से पार पाना है, माया
03:57म्रिग द्रिष्णा पैला करती है, धनीत सत्ता, रूप, आदी का मोह माया के प्रभाव से ही होता है, मोह के
04:04कारण हम नाश्वान को शाष्वत, अप
04:18यदिक रूप में बंद जाते हैं, उसके बिना जीवन को अपून ही समझते हैं, भावनात्मक रूप में हुआ यह जुडाव,
04:25पीडा का कारण भी बन जाता है, तृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि काम और क्रोध से उत्पन होने वाला
04:32यह मोह, आत्मा को पतन की और ले जात
04:35है, काम एश प्रोध एश रजोगुन समुद्भवह, महाशनो महापापमा विध्यरनम इह गैवेनम, रस जीवन का आनंध है, प्रेम है, नियोचावन
04:47है, नीरसमन धक जाता है, तब प्राण शिथिल पर जाते हैं, प्राण जीवन की गती हैं, प्राण ही रूपांतरन है,
04:54�
04:57सही में जीवन की गती ही तय करता है, तक्रती के साथ रहकर भी विरुद्ध रहकर भी, अव्यपुरुशी दमरूप आधार
05:07है, स्रिष्टी का, माया से आवरित्य स्रिष्टी मन बहुस्याम का मार्ग है, मुक्ति भाव, मुमुक्षा भाव, पुनह ब्रह्म में लीन
05:16हो जान
05:16का मार्ग है, दोनों ही प्रकार की कामना का मूल आधार माया है, दामपत्य भाव में इसका समावेश दिखाई देता
05:24है, माया के स्वरूप में काल के साथ मन के भावु में भी वरिवर्दन होता है, आश्रम व्यवस्था में भी
05:30वरिवर्दन होता है, इसके साथ ही जीवन की
05:43पुरुष अपने ब्रह्मचर्यकाल में अपने पौरुष और ज्यान को परिपक्व करता हैं, चंद्रमा की सोलह कलाओं का भोग भी करता
05:51हैं, चाहे वह घर पर हैं, चाहे गुरुकुल में, उसके स्थ्रेंड स्वरूप के पोशन में कमी रहती ही हैं, आज
05:58तो गुरुकुल व
06:03ठहर सा गया, ध्यान जैसे परंपराओं ने व्यायाम का रूप ले लिया, गुरुष श्य एकातार होते ही नहीं है, वहीं
06:12इस्त्री का स्वरूप भी बदल रहा हैं, उसे ब्रह्म के जीवन में अर्धांगिनी बनना है, उसका विवर्थ बनाना है और
06:19उसी में समा जाना है,
06:20अन्त में ब्रह्म वहीं लोट जाये, जहां से आया था, माया को ब्रह्म का कार्य करके चले जाना है, माया
06:28बल का नाम है, किसी प्राणी का नाम नहीं है, ब्रह्म भी रस है, उसको स्वरूप देकर उसका पोशन करना
06:34ही माया का काम है, माया चेतना है, रस में बलों की चिती कर
07:07ुश्व
07:13ुश्रिश्टि की चाल उल्टी हो गई ब्रह्म के नाम से माया की इच्छा जीवेच्छा प्रबल हो गई और विश्व में
07:20एक नया तांडव शुरू हो गया नमस्कार
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