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  • 8 hours ago
स्वयं को समझें

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00:00नमस्कार, मैं श्वेता तिवारी आप सभी का अभिनन्दन करती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक,
00:09विद्या वाचस्पती गुलाप उठाडी जी का स्पंदन में प्रकाशित आलिक, जिसका शीशक है, स्वयम को समझें.
00:30जो की समय के साथ उसकी नजर में छोटे होते चले जाते हैं. हम यदि गुलाप के फूल को देखें,
00:36तो क्या उसकी इज़त पंखुडियों से नहीं है? क्या बिना कांटों के वह सुरक्षित रह सकता है? यदि उसकी पंखुडियां
00:43गिर जाएं, तो उसकी सुगंद भी चल
00:58सकता है? शास्त्र कहते हैं आत्मा से आत्मा को देखो. व्यक्ति एक बीज होता है, पेड उसका परिवार होता है,
01:05फल उसकी कमाई होती है. जब भी स्वैम की चिंता में लग जाएगा, क्या वह कभी जमीन में दब जाने
01:12को तयार होगा? क्या वह कभी पेड बन पाएगा? इ
01:27जदी कुठली आधे रास्ते में ही काम करना बंद कर दे, तब आगे आम नहीं लगेंगे. भारतिय मनिशा मानती है
01:34कि व्यक्ति अपने पीछे और आगे की साथ-साथ पीडियों से बंधा रहता है. आम नहीं लगा, तो उसकी मुक्ती
01:40संभव नहीं है. जो धन, पद की महत्�
01:53अमी यह समझ जाए कि मैं शरीर नहीं हूँ. इसके भीतर रहने वाला हूँ. तब ही वह परीजनों के बीच
01:59में रहकर सारी कामनाओं से मुक्त रह सकता है. तीनों गुणों से मुक्त रह सकता है. यही प्रग्या पुरुष के
02:05लक्षन है. इस जीवन का उसके आत्मकल्यान से
02:09कोई संबंध नहीं होता. उसका एहनकार उसे अन्यतर देखने ही नहीं देता. उस स्थिते में भी उसके परीजन, पत्नी, पुत्र,
02:17माता, पिता, बंधु, बांधु, जो सभी उसके साथ अपने कर्मों का फल भोगने के लिए पैदा हुए हैं. वे व्यक्ति
02:24के जीवन में क
02:25अभी पुरक हो ही नहीं पाएंगे. वे ही कड़वे, मीठे, बोल, हतियार की तरह काम में लेते हुए व्यक्ति के
02:31प्रग्या जक्षू खोलते हैं. जूटके आवरणों को ध्वस्त करते हैं. हर व्यक्ति एक दरपन का काम करता है. सिली मानव
02:39एक सामाजिक प्राणी है. बन्
02:52अध्यात्मिक, सामाजिक, वयक्तिक आदि. एक व्यक्ति किसी का फुत्र होता है, तो किसी का पिता भी, भाई भी, चाचा भी,
03:00मामा भी. अनेक रिष्टे एक ही व्यक्ति में समाहित होते हैं. और इनहीं के अनुरूप अलग-अलग परिस्तितियों में उसे
03:07व्यहवार करना
03:08पड़ता है. तारिक शेत्र में भी वह कहीं किसी से बड़ा होता है, तो उसी स्थान पर किसी से छोटा
03:15होता है. इसी के अनुरूप वह व्यहवार परिवर्तन भी करता है. इससे भी आगे बढ़कर देखें, तो प्रतीत होगा की
03:21व्यक्ति स्वयम भी अनेक धरातलों पर जी
03:38पुद्धि निर्नय और नियंतरन करती है. शरीर इच्छा पूर्ति के लिए कार्य करता है. शरीर को ही इंद्रियों के रूप
03:44में जाना जाता है. प्यक्ति मन की इच्छाओं की पूर्ति के लिए जीता है, कार्य करता है. इच्छा पूर्ति के
03:51साथ ही उसके सुख दुख की
03:52अभिव्यक्ति जुड़ी हुई हैं, बुद्धी और शरीर साधन रूप में मन के साथ जुड़े हुए हैं, किसी भी कार्य को
03:59परिणाम तक ले जाने के लिए आवश्यक है साधन का शुद्ध और सही अवस्था में रहना, ग्यदि शरीर स्वस्थ और
04:06बुद्धी स्वस्थ है
04:07इनका वातावरन शुद्ध है, तो मन की इच्छाएं पूरी होने में रुकावट नहीं आएगी, कार्य के लिए भी सही और
04:15शुद्ध इच्छाओं का ही चयन किया जाएगा, इच्छाएं व्यक्ति की मर्जी से पैदा नहीं हो सकती, निर्मानोन मुखी इच्छा इश्वर
04:23की देन होती है, ध्वन्सोन मुखी इच्छा मानविय देन होती है, मन से आत्मा जुडा होता है, वहाँ इश्वर की
04:29सकता है, वही सारे कर्म के मूल में हैं, अतह व्यक्तित्व विकास के लिए पहली वह मूल आवशक्ता है स्वयम
04:37को समझना, अपने विभिन धरातलों की जा
04:44चालन व परिवर्धन करना, ताकि उनमें संतुलन बना रहे, सभी कारियन निर्विधन संपादित हो सके, नमस्कार
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