00:03नमस्कार, मैं श्वेता तिवारी आप सभी का अभिनन्दन करती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादत
00:11विद्या वाचस्पति गुलाप उठारी जी का स्पंदन में प्रकाशित आलेख जिसका शीर्षक है मोह ही बंधन का हेत�
00:19मोह एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है गहरा लगाव, आसक्ति या भ्रम। वह केवल एक भावना नहीं बलकि मन
00:28की एक ऐसी इस्थिती है जो सच्चाई को देखने से रोगती है।
00:49मोह का कारिक्षेत्र भी लंबा चौड़ा है, सभी ज्यानेंद्रियों के विशय मन से संचालित होते हैं।
01:19ब्रम्ह की इच्छा एको हम �हुझ स्याम ही है
01:34अतह मनगों बिना समझे कर्म तथा कर्म की दिशा को समझा नहीं जा सकता
01:41दोनों ही त्रिगुन सथ रजतम के प्रभाफ में स्वतंत्र कार्य भी करते है
01:47जीवन संग्राम की रूप रेखा यहीं बनती है
01:50गीता में कृष्ण कहते हैं कि कर्मों को मुझे समर्पित कर दो
01:53करता भाव से मुक्त हो जाओ
01:55मोह ऐसा नहीं होने देता
01:58मोह के आवरण में जो है वह दिखाई नहीं देता
02:01जो नहीं होता वह प्रतीत होता है
02:04कस्ती को साप समझने जैसा
02:06सम्मोहित व्यक्ति का यही मिध्यात्व भाव होता है
02:09वेदान्द में यही अज्यान है
02:11मोह का श्रेष्ट उदाहरण विश्णू का मोहिनी रूप ही है
02:16मधु कैटप से जब देता जीत नहीं पाए
02:19तब विश्णू ने मोहिनी रूप धारण कर
02:21दोनों असुरों को मोह पाश में बांध लिया
02:24तथा उनका संघार किया
02:26यह उधारण मोह की शक्ती का सूचक है
02:29प्रत्यक कारे की काल, सीमा और फल भी निश्चित होते हैं
02:33फल ही कारे की पूर्णता है
02:35जब तक अपने सभी कर्मों के फलों का भोग पूरा नहीं हो जाता
02:39आत्मा पुनर जन्म लेता रहता है
02:41ब्रह्म की यात्रा निरंतर गतिमान रहती है
02:44एक काल ऐसा भी आ जाता है
02:46जब आत्मा रूप ब्रह्म अपने मूल इस्थान को लोट कर शून्य में लीन हो जाता है
02:52यह तब ही संभव है
02:53जब कर्म तो किया जाए किन्तु फल पैदा ही न हो
02:57पुराने संचित कर्मों के फल भोग कर लोटना संभव हो सकी
03:01केवल मानव शरीर में ही यह संभव है
03:04कि मैं अपने कर्म के स्वरूप का ज्यान करके जीवन को लक्षित कर सकता हूँ
03:09अन्य सभी भोग योनिया हैं
03:11जो स्वतंत्र कार्यतों केवल शुद्ध चेतना के जागन से ही कर पाती है
03:16गजेंद्र मोक्ष जैसा उधारन अपवाद ही है
03:20अधिकार शब्द के मुह ने ही अर्जुन को धर्म भीरू और दुर्योधन को कर्म भीरू बनाया
03:26जहां दोनों के अधिकार केवल कर्म परियंत सीमित थे
03:29That is a sign of the power of the religion all over the skull
03:40Host s officer got the truth
04:05ुद्ध में अपने स्वजन ही मारे जाएंगे,
04:12परिणाम तह हमें पाप ही लगेगा,
04:15इस कालपनिक फलांश दिष्टी ने अर्जन को शास्त्र सिद्ध आधिकारिक कर्म से विमुख कर दिया,
04:21दुरियोधुन का वी सामराथ्य सुख लिपसा के फलांश ने अधिकार सिद्ध कर्म से पराख मुख कर दिया,
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