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  • 14 hours ago
आधुनिक युग में सनातन परंपराएं कहीं पीछे छूटती जा रही हैं. इसका मूल कारण और समाधान क्या है? पढ़िए अंकुर जाकड़ की रिपोर्ट...

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00:00বব৅্ય বোષ્યব্વે বোષে
00:02I am the Lord.
00:32Kiki in Paramparāo ko na to Puri Tera Samaj pa rahi hai
00:35Or na hi unha aage badaanee ka prayas ho raha hai
00:40Aisai mein badalti e samay samajik dhanche
00:42Or adhunik jeevan shayali ke prabhao me
00:45Yehi paramparāe ab dheere dheere shere hooti nazara rahi hai
00:50Aaj ek baat aati kutumbu prabhodhan ki
00:53Ko itna bada ho ta ta ki har vars kuchna do-tean vivaabhi hootate te
00:56Do-tean vittiyu bhi hootate te
00:58Do-tean bachon ke jnbhi hootate te
00:59Tho hamaari jau paramparāe tii
01:32artists
01:37Fr.
01:423
01:422
01:422
01:432
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01:433
01:44सब्सक्राइब torek предст
01:49अरोनी का उदाहरण देते हुं कैसे आरोनी ने
01:54कर अपना करता वर्य निभाया लेकिन आज यह भावना कमजोर
02:03पड़ द्युक्श के वल जानकारी तक सीमित रहे हैं और संसचारivities
02:09foreign
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02:35foreign
03:12प्रस्पेसर नंद किशोर पांडे ने एक शलोक का उल्लेख किया
03:16अग्रतह सकलम शास्तरम पृष्टतः शशरम धन्म इदम ब्रह्मम इदम शात्रम शापादपी
03:23शरादपी इसका अर्थ है कि आगे शास्त्र यानि ज्ञान और पीछे धनुषबान यानि शक्ति होना चाहिए ये बताता है कि
03:33केवल ज्ञान ही नहीं उसकी रक्षा के लिए शक्ति भी आविश्यक है उन्होंने नालंदा विश्विद्याले का उदाहरन दिया कि वहाँ
03:41शास
03:52प्रिती को भी नुकसान पहुचा सकता है इसी लिए निरंतर ये प्रयास करना चाहिए कि शारिरिक सामर्थ स्वयम का भी
04:00बढ़े और समाज का भी बढ़ता जाए यही सामर्थ राष्ट्र का सामर्थ होता है
04:07परियावरन का शंकळ बढ़ा है सनातन हमेशा से परियावरन की बात करता है
04:15शकूंतला विदा होती है तो करने रिशी को ध्यान में आता है कि आज वह शकूंतला विदा हो रही है
04:24जो पातुम न प्रत्मम जो श्वैम पहले जल नहीं पीती थी
04:31पहले पौधों को जल पिलाती थी फिर जल पीती थी
04:35वो शकुंतल आज हमारे आसरम से विदा हो रही है
04:40शकुंतल आज उन पौधों को लगाती थी
04:42उनका जन दिन मनाये जाता था
04:45He was given to them.
04:47We are calling our children.
04:50We call them, we call them.
04:53But who is calling them?
04:56If they are calling them,
04:59they are calling them,
05:00they are calling them?
05:02So, this is why the nature of our trees is very important.
05:05Our trees are coming from our trees.
05:08So, we have to tell them,
05:10that we are bringing the trees.
05:13Bhagavad Gita says,
05:23ुप्रियावरन को जितना हम ध्यान लखेंगे उतना फल फोल ब्रिक्ष शाया पर्यावरन की सुरक्षा अंततो गत्वा पर्यावरन की सुरक्षा संपुर्ण
05:40सांस्कृतिक सुरक्षा है
05:45प्रोफेसर नंद किशोर पांडे बताते हैं कि वेद अध्ययन से ही वेदों की रक्षा का भाव है
05:51धीरे धीरे संस्कृत के सूत्रों को पढ़कर ध्यान रखने की बात खत्म हो गई तो संतों की परंपरा शुरू हुई
05:58उन संतों ने उस वैदिक परंपरा को आम जनता की भाशा में यानि बोलियों में कहा
06:05वेदों को मौखिक रूप से संरक्षित किया गया
06:08तुलसिदास ने अवधी में, कबीर ने साखी में, मीरा ने राजस्थानी में, गुरु नानक ने पंजाबी में
06:15संत नामदेव ने मराथी और पंजावी में, इसी तरह संत रविदास ने ब्रज और पूर्वी हिंदी में, सूर्दास ने ब्रज
06:24भाशा में, दादु दयाल ने राजस्थानी और हिंदी में
06:27इसके अलावा तुकाराम ने मराथी में, नर्सिन महता ने गुजराती में, अक्का महादेवी ने कन्नर में, लालेश्वरी ने कश्मीरी में
06:36वैदिक परंपरा को आम जनता तक पहुचाया।
06:43सनातन की सबसे बड़ी विशेश्टा ही उसके निरंतरता है, ये ठहरता नहीं, बदलते समय के साथ खुद को ढालता जरूर
06:51है, लेकिन समाप्त नहीं होता, इतिहास गवा है कि कई बार इसकी धाराएं कमजोर पड़ी, लेकिन हर बार समाज नहीं
07:00इसे फिर से मजबूत किया।
07:02आज भी वही समय है, जब परंपराओं को केवल अतीत की याद मान कर, छोड़ देने के बजाए उन्हें समझ
07:09कर, अपना कर और अगली पेरी तक पहुचाने की जिनमेदारी निभानी होगी।
07:14अगर आज प्रयास नहीं हुआ, तो आने वाली पेरियां सनातन को किताबों में तो पढ़ेंगी, लेकिन उसे जी नहीं पाएंगे।
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