00:00कराची के शोर्स से कुछ फासले पर एक ऐसी जगा पाच्राने जबल जो किसी जन्नत से कम नहीं है पहाडों
00:07की खामोशी ठंडी हवाएं और दिलकश मनाजर यहां आकर वक्त जैसे टहर सा जाता है चटानों से टकराती हवा और
00:15सूर्ज की रोशनी में निकरते रंग ऐसा मनज
00:19बनाते हैं जैसे कुदरत ने खुद तस्वीर बनाई हो कि जगा सिर्फ एडवंचर नहीं बलके सुकून का एक एहसास भी
00:26है जहां दिल हलका होता है और जहन पर सुकून अगर आप शहर की हलचल से दूर चंद खुबसूरत लम्हें
00:34बिताना चाहते हैं तो पाच्राने जब
00:36आपका मनतजर है
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