00:00आचारी जी आजकल देखा जाता है कि बच्चों के उपर हिंसा बहुत हो रही है
00:05उनको छोटी-छोटी बातों पर मारा पीटा जाता है
00:09चेहरों की सडकों पर ना सुबह-सुभह गाडिया निकलती हैं
00:13जिनमें छोटे-छोटे पिंजडों में मुर्गे कैद रहते हैं
00:18ये हमारी सभिता और संस्कृती है
00:21कलकत्ता में मैंने देखा वहां गाडियां भी नहीं थी
00:25वहां साइकल में दोनों तरफ पैरों से बांध के 20-20 मुर्गे लटका रखे थे जिन्दा
00:33तुम्हें क्यों लग रहा है कि हम किसी भी तरह कि जगन्य हिंसा नहीं करेंगे किसी छोटे बच्चे के साथ
00:44मैंने देखा मचलियां बिक रही थी और उनको परात में रखा गया था
00:50उस परात में कुल इतना उचा पानी बस इतना ही कि वो मचलियां किसी कदर जिन्दा है तब तक जब
00:59तक कि उन्हें ग्रहाख खरीद न ले
01:01तक कि दा मूचे लगें ये कहके कि मचली ताजी है और वो मचली अपना मूँ खोल रही है सांस
01:08लेने के लिए तड़ रही है ये हम है
01:10हम किसी को भी फाड़ सकते हैं अपनी हवस की पूर्ती के लिए
01:15और इतना ही नहीं हम किसी को भी जिन्दा भी रख सकते हैं अपनी हवस के लिए
01:19जैसे उन मचलियों को जिन्दा रख रहे थे
01:21हम किसी को जिन्दा भी रखते हैं तो उसमें कोई करुणा नहीं होती
01:24उसमें भी हिंसा होती है
01:27यह हमारी दुनिया है
01:29यह बिलकुल हमारे जैसी है
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