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  • 7 hours ago
बुद्धिमती मां भ्रान्तिरूपा

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00:02नमस्कार, मैं श्वेता तिवारी आप सभी का अभिनन्दन करती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ राजिस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक
00:10पिद्या वाचस्पती गुलाब पुठारी जी का परिवार में प्रकाशित आदेग, जिसका शीशक है, बुद्धी वत
00:29प्रध्या, विवेक, बुद्धी, आदि, आज व्यक्ति की शिक्षा बुद्धी प्रधान है, वहां प्रध्या का जागरन होता ही कहां है, बुद्धी
00:38मान एक और धर्म रिपेख्श हो गया, वहीं दूसरी और संबेदन हीन होकर रूखा हो गया, जब पूरा परिवार ही
00:45
00:45उच्छ शिक्षा प्राप्त हो, महा का वातावरन कैसा होगा, उसी परिवार का कोई व्यक्ति, अशिक्षित अध्वा, अर्ध शिक्षित भी हो,
00:54तो उस पर क्या बीतेगी, प्रिष्ली पीड़ी की अधिकांश माताय अशिक्षित होती थी, गावों में स्कूल भी नहीं थ
01:13टिफिन भी कपड़े का रुमाल था, एक सूखी, बिना चुपडी रोटी, उपर नमक, मिर्च, अमचूर, बुरा का मिश्रण, खाते समय
01:23पानी से चत्नी सा लगावन तयार करके खाल, मा की एक भूमी का समाप्त, दूसरी भूमी का में शाम का
01:30खाना खिलाना, चिमनी, लाल
01:32आटेन के प्रकाश में समय से खा लेना स्वत्र ही हो जाता था, अंधेरे में बाहर कितनी देर तक खेल
01:38सकता था बुच्चा, समय पर सोना, सुर्योदय के पूर्व उठ जाना, गाव में अनाज पीसने की चक्की घट्टी कहा थी,
01:47उसी चिमनी के प्रकाश में महिलाएं गेह
01:49पीस्ती, हर घर से एक सा जीवन संगीत निकलता था, छोटे परिवार में काम कम था, तो महिलाएं कुए से
01:57जल लेने जाती, हस्ती गाती लोटती थी, गट्टी पीस्ते समय भी गाने की कारण थकान की अनुहूती नहीं होती थी,
02:05सबके ही जीवन का यह अनिवार्य अंग था
02:08उस महिला का बच्चा जब अगहर आकर कहता है कि बिजली जैसी कोई चीज शहरों में कई काम कर देती
02:15है, मैं भी बड़ा होकर तुम्हारे लिए बिजली लाओंगा, मा के चेहरे के भाव पढ़े जा सकते हैं, क्या किसी
02:23भी शिक्षित परिवार में मा बेटे के बीच ऐसे स
02:26सुने जा सकते हैं, बेटा पढ़कर, मास्टर बनकर कहीं और चला गया, न बेटा आया, न ही बिजली, मा की
02:34प्रतीक्षा, शिक्षा ने जीवन चीन कर मौत से अविद्या के परिवार से जोड दिया, सत्य चीन कर जूट से लपेट
02:42हिया, शिक्षा ही इस देश में प्रत्यक
02:56करने और ध्रश्टाचार के वर्त्मान स्वरूप तक जाने का सामर्थ्य नहीं हो सकता, माया ने शिक्षा के रूप में जगत
03:04में एक नई चकाचौंध पैदा कर दी, माया के दो बड़े आधुनिक रूप सामने आये, मानू कल्युक को प्रले तक
03:12पहुचाने आये हैं, दो
03:25कर्म निप्रेक्षता के आवरण में धरस्त कर रही है, शिक्षित मानू पत्राता जा रहा है, उसके भोग में भी रस
03:32नहीं रहा, शिक्षा ने आत्मा का दर्वाजा ही बंद कर दिया, रस्तो आत्मा का विशय है, जीवन नीरस हो गया,
03:40भारतिय जीवन शैली प्रक्रती आ�
03:55बन जाता था, रात्री विश्राम भी खुले गगन के बीच जहां सोम बरस कर ठकान की फूर्ती करता था, व्यक्ती
04:03चार घंटे में तरो ताजा हो जाता था, वातानू खुलित कमरे में आठ घंटे सोकर भी ठका हुआ ही उठता
04:11है, बिजली ने विकास के नए नए मागु हो
04:14नया तकनी की विश्व खड़ा कर दिया, चांद पर जा पहुंचे, रात को दिन में बंदल दिया, तकाश को भी
04:21सूर्य के संकक्षिला कर खड़ा कर दिया, दूरियां समाप्त कर दी, समय की परिभाशा बतन डाली, एहंकान ने नया विद्धारन
04:30कर दिया, आज यदी महाभ
04:32भारत का युद्धिन हो जाए, तो लजारा कुछ और ही होगा, शिक्षा ने जीवन को संकुचित कर दिया, अब दान
04:38बीर करने नहीं होगी, आज का दान काले धन से जुआ है, धर्म भी इसी धन से वैभा प्रात कर
04:46रहा है, साधु संत तेल्वीजन के पचार पसार के नशे
04:50में डूबने लगे, धन को व्यापार के वस्त्र पहना कर धनात्य बन बैठे, इसी से मुक्त होने के लिए ही
04:57तो सन्यास लिया था, शिक्षा ने इतना धर्म निर्पेक्ष बना दिया, कि अब तो तुनाव लड़कर संसब तक पहुँचने लगे,
05:06अर्थ और काम के नए सं�
05:20का विकास कर दाना, जहां चारों और बस उसी की चका चौंध है, ग्लैमर, नशा, भोग का एक नया देश
05:28तैयार हो गया, सुनाधा, लक्षमी के वाहन उन्लु को प्रकाश में दिखाई नहीं देता, नव धनाध्य बिढी इस रात्री विश्व
05:37की वड़ी प्रजा है, संप
05:49तीन चौथाई असुर कोते हैं, कल यूग में तो सरवत्र व्याप्त दिखाई पड़ते हैं, जब संत भी मुखोटे हटाते हैं,
05:58असुर बन जाते हैं, सच पूछो तो अकेली बुद्धी की भी सारी भूमिका नहीं, कामनाय तो मन में उठती हैं,
06:06बुद्धी में नहीं, औ
06:10और हन सारा पासा यहां पलड़ जाता है, बच्चा भही मांगता है, जो माने पेट में खिलाया है, अत्वा जो
06:17उसके स्कूल में साथी चर्चा करते हैं, टिफिन में लाते हैं, आज तो सोशल मीडिया भी कई वेंदेनों की मार्केटिंग
06:24करता है, मन बाहर खाने को याद कर
06:28स्वाद ही रह गया, मन नित नया मांगता है, रस शब्द कहीं चर्चा में नहीं आता, संपोन जीवन से रस
06:36बाहर निकल गया, रस किसी भी कर्म का लक्षय ही नहीं रहा, रस आत्मा का विश्य है, इश्वर की उपस्थिति
06:44का प्रमाण है, माभी दूर हो गई इश्वर से, �
06:48घानती रूप में जगत में व्याक्टत हो गई, या देवि सर्व भूरतेशू, घानती रूप में इन संस्थिता, नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये
06:58नमो नम, नमस्कार
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