00:28।
00:40अलग अलग वादियंत्रों को लेकर ये कलाकार 36 गड़ाएं है।
01:12गाँ गाँ में अब दीजे और गाजा बाजा उपलब होने के चलते इन कलाकारों की डिमांड कम हो गई है।
01:18लेकिन पुर्खों से मिली व्यासर को न सिर्वे संभाल रहे हैं बलकि उनका कहना है कि इन वाजों की गूंज
01:23सुनकर नहीं नाच्टे वालों के भी पैर धिरक जाते हैं।
01:35आपको दिल धरक जाता है। जितने भी नचनिया मन भी धरक जाता है। उसका दिल भी दूसर हो जाता है।
01:42नहीं नचया भी नासता है। उसका पैर पढ़ जाता है।
01:49चले भापको पुराने वादियंत्रों के बारे में बताते हैं। यह है ढोल। इसे आपने देखा ही होगा। इसका निमान खोकली
01:56लकडी सिकिया जाता है। और दोनों छोर में चम्रे को मजबूती से कस दिया जाता है। इसे बजाने के लिए
02:02दोनों हाथ में लकडी का डं�
02:17दिखता है। इसे बजाने के लिए चम्रे के ही दो स्टिक का उप्योग होता है। कभी-कभी इसे कलाकार हाथ
02:24की कुहने से भी बजाते हैं। इसी तरह है यह मोरी। मूँ से फूक मरकर अलग-लग धुन इससे निकाली
02:32जाती है। मूल रूप से इसी वादियंत्र से यह ग्र
02:47को तो भुजुर्ग लोग इश्वर की देन मानते हैं। यह कलाकार औरिशा से चाथिसगर के अलग-अलग जगों पर जाते
03:02हैं। यह नजारा जाजगीर चापा का है। जहां राम बाना तलाप के पास यह कलाकार एक से दो महीने अपना
03:08ठिकाना बनाते हैं। और इस वीच �
03:11गाउं के लोग जिनके यहां शादी विवाज ऐसे आयरेजन होते हैं, वो इन्हें बुलाने आते हैं। पैसो को लेकर बात
03:17तैह होने के बाद वुकिंग होती है और यह चल पड़ते हैं लोगों को नचाने के लिए। जाजगीर चापा से
03:31एटीवी भारत के लिए प्रशान
03:33सेंके लिपू
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