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  • 6 weeks ago
करवट बदल रही माया

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00:28नमस्कार
00:30आश्रम में स्त्रेण हो जाता है संसकारवान पुरुष तब कहते हैं कि वह भी कई को इस तनों से दूद
00:36बिलाता है आसाराम नहीं रामकृष्ण परमहंस आज समयने करवट बदली है शक्ति करण के नाम पर जबकि वह स्वयम पुरुष
00:44की शक्ति है उसके भीतर भी आधी स्त
00:47वैठी है अर्धनारिश्वर रूप में भी दोनों के स्थूल सुक्ष्म कारण रूपी भी है और घंदरल विरल रूप भी है
00:57सुक्ष्म शरीर अव्यपुरुष है जहां पुरुष केंद्र तथा इस्त्री आवरण या परीधी है स्थूल में भी पुरुष केंद्र है और
01:05वक्ष्टि प्रिधी से ही स्वरूइप आक्रती निऊमिद होती है , पुरुष एहन्किरती और प्रकRती नियामक संचालत के रूप में कार्य
01:14करती है , आक्रती मन बुध्धी एहन्कार मिलकर अप्रा प्रक्रती है
01:19पराप्रक्रति में शृदय, ब्रह्म्ह, विष्णू, इंद्र, प्राण, समू, प्रमुख हैं
01:24इसी के केंद्र में अव्य जुड़ा रहता है
01:26शृदय ही अगनी सोम के आधार पर जीवन चलाता है
01:30यही अव्य में तारप्ज से जुड़कर जीवन प्रम चलाता है
01:34अव्य के केंद्र में पराप्र रूप रहता है
01:38ब्रह्म के अतिरिक्त सभी तत्व परिवर्तन शील है
01:41माया भी स्रिष्टी की प्रलय अवस्था में लीन हो जाती है
01:45आज माया ने करवट बदली
01:47माया स्वयम कितने रूप बदलती हैं स्रिष्टी चलाने को
01:50श्रिष्टी के सभी सुख दुख वाले भाव, नरक जैसी यातनाएं, युद्ध के परिणाम, सुन्दर्ता का माया जाल, भोगों के भिन्न
01:59भिन्न स्वरूप, बलातकार और वैश्या वित्ति का विरोधा भासिय भिने, आदि सभी तो माया की योजनाओं के अंग है।
02:06पुरुष के पास करने को कुछ नहीं है, माया के हातों का खिलोना मात्र होता है, जीवात्मा सदा माया से
02:13आबरत रहता है, हर यूग परिवर्तन के साथ माया करवट बदल दिखाई पड़ती है, सीता उतनी आकरामक नहीं रही जितनी
02:22की दौपदी, आज माया केंद्र का इस्�
02:35स्वामित्व हटने लगा है, नया नरेटिव, यह मेरा शरीर है, कुछ भी करूँ, चल पड़ा, प्रकरती को भी हर मोल
02:43पर चुनावती देने लगी, इसमें उसके दो आयुन जोनों हातों में है, शिक्षा के अनुपात में स्वज्धन्दता और सोशल मीडिया
02:50सम्विध्ध
02:50के अनुपात में भूग, घर में संतान को बराबरी का दर्जा सदा ही मिलता रहा है, सुविधाय, अवसर एवं सम्मान
02:59में बराबरी के साथ ही सुरक्षा में अतिरिक्त ध्यान रखा जाता है, अपमान तो किसी इस्तर पर नहीं होता, हाँ,
03:06जीवन की भावी भूमिका को ध्
03:10अभ्यास कराये जाते रहे हैं, इसमें खाना बनाना, रख रखाओं के विभिन पहलू, छोटे बच्चों को रखना आदी सम्मिलित रहते
03:18हैं, संयुक्त परिवार में रहकर जन्म, परण, मरण के अतिरिक्त, बार्ट योहार और देवी देवताओं के कर्म तक सीख लेती
03:26है
03:26इसका प्रभाव ग्रहस के रूप में पूर्ण इस्त्रेंड भाव में सोचा जा सकता है, पत्नी, मा के रूप में लगभग
03:33सभी कर्मों की जानकरी हो जाती है, धैर्य, त्याग, मौन, कर्म निष्ठा जैसे सभी गुण ग्रहन कर लेती है ताकि
03:41हर एक परिस्थिती में सहज
03:42जी सके, आजमानों जीवन से इस त्रेंड भाव से ही दुराव होने लगा है, मात्रित्व का अफमान तक होने लगा
03:50है, एक और समय पर शादी न करना, जबकि इश्वर उसे 12-13 वर्ष की उम्र में यह सुविधा उपहार
03:56में दे चुका होता है, क्या यह स्वैम माया का निर
03:59जबनने नहीं है, उसके पास अंतर दिश्टी हैं जो पुरुष के पास नहीं है, उसको परोख्ष भाव में जीना, बोलना
04:05आता है, जो पुरुष को नहीं आता, अतहा वह स्वैम को पुरुष से श्रेष्ट समझने की भूल करने लगी है,
04:13इस त्रीकी भूमिका का तिरसका
04:14करने पर आमादा दिखाई पड़ती है, शादी देर से करना एक बात है, लिविन में रहना अलग बात, पढ़ाई के
04:22दौरान मा बन जाना एक अलग बात है, इसी दौरान गर्भपात के उधारन को स्वच्छन्द चिंतन एवं प्रक्रती तथा सामाजिक
04:30मर्यादा का उलंग
04:32आज तो भूमी का क्या नेक स्वरूप हो गए, जो कुछ आज विक्सित देशों में हो रहा है, कल वही
04:38हमारे यहां भी होगा, आज तो अंचाही संतान को फेंक कर चले जाना सहज सा लगता है, संतान को मार
04:45देना भी सुनाई देता है, इस्तन पान भी कराने को राजी नहीं ह
04:49हो पाती है, इसके बदले दूद बेच देना सहज लगता है, कोख किराय पर मिलने लगी है, कहीं आवश्यक्ता से
04:57अधिक दिखावे और शान शौकत के साथ धांपत्य सूत्र का वैखो प्रदर्शन किया जाता है, शादी तो दूर, सगाई के
05:03लिए भी उप्युक्त इस्थ
05:16से कम नहीं है, शादियों के लिए विदेश यात्रा प्रथम विकल्प माना जाता है, हमने सीखा है कि घर की
05:23पोन कुवारी न रह जाए, आज तो बच्चे की वर्ष घांट घर पर नहीं मनाई जाती, अठमास कूजन का नाम
05:30बेबी शावर हो गया, जिसी को यह मालूम नहीं
05:32होता कि यह संसकार क्यूं है और क्यूं आवश्यक है, हमने जिस प्रथा को अप्शकुन माना, पिता के लिए घातक
05:40माना, वह तो उच्च रेणी में स्टेटर सिंबल बनती जा रही है, कौन सी? पती का प्रसव कक्ष में, प्रसव
05:47काल में उपस्थित रहना, पत्नी का हाथ �
05:50रहना, वह भी समझ जाएगा कि प्रसव पूरा क्या होती है, जदी पत्ती बाहर गया हुआ हो तो ऑपरेशन है,
05:57वैसे आजकल डॉक्टरों की भी पहली पसंद से जेरियन ही है, हाँ उसमें भी बड़े घरों वाले मूर्थ रिकलवाने लगे
06:04हैं ताकि उनकी घरों में भी �
06:06लाम क्रिश्न अवतार ले सके, भले ही पूरे प्रसव काल में किटी पार्टी, सिगरेट, शराब के दौर रहे हैं, विकलांग
06:13संतान भी हो तो भी कोई बात नहीं है, शादी के बाद भी इस्त्री पिता के चलहा से चलने लगी
06:19है, ससुराल पक्ष उत्र शिक्षा प्राप्
06:35और यहीं से शुरू होता है वाक्रित, क्योंकि दोनों बुद्धिमान और कमाव पूत है, समझोता संभव कम ही हो बाता
06:42है, लड़कियां विशेश रूप से पिता के मार्ग दर्शन में चलती हैं, जो लड़कियों को अलग होकर स्वतंत्र जीने को
06:50अपने पाओं पर खड�
06:51प्रेडित करते हैं, मार्ग दो सहजिस्ता से उपलब्ध हो जाता है, किन्तु जहां विवाह परंपरा से होता है, महां इस्त्री
06:59को भारी बढ़ता है, कानुनी विवातों मात्र समझोता है साथ रहने का, उसका अध्यात्म या आत्मा से कोई लेना देना
07:07नहीं है, एक तरह क
07:08लिवग नहीं है, घर वालों की आग्यास है, सहसुराल में एस्तृ की प्रतिष्ठा भिन्ने प्रकार से होती है, अगली पीड़ी
07:15की ग्रह स्वामीनी भी होती है, अतहे खांदान के लिए बहुमल्य संपधा होती है, संतान को साथ पीड़ी के पित्रों
07:23से जोड़ती है, शर
07:41Thank you for your attention.
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