00:00आपके कमरे में संद कबीर की जो है तस्वीर भी लगी रहती है
00:04तो फिर आप अद्वैत की बातें करते हैं और आपने किसी की तस्वीर लगा रखी है
00:10ये चित्र ये छवी मूर्ती ये मुझे अमूर्त में ले जाते हैं
00:17विचार की पूरी प्रक्रिया द्वयतात्मक होती है
00:21मैं अगर एक ऐसी छवी को देख रहा हूँ
00:24जिसको देखने से विचार शान्त हो जाते है
00:29तो वो जो चित्र है वो मेरे लिए भहुत उपयोगी साधन है
00:35किसी इसका साधन है अद्वयत में प्रवेश करने का
00:38ठीक वैसे जैसे अगर आप एक जंगल में फसे हुए हो तो जंगल से बाहर जाने का रास्ता भी जंगल
00:43से होकर गुजरता है
00:45उसी तरीके से ये मन जो कि जैविक रूप से शाड़िक रूप से छवियों का और अनुभवों का गुलाम है
00:53तो इसको अगर शांतिता और मुक्तिता भी ले जाना है
00:57तो कुछ चमिया, कुछ मॉर्तिया उपयोगी होती है
01:01इसलिए मुर्थ पूजा का अभी विरोध नहीं करता
01:04अगर मुर्ति पूजा आपको वास्तव में निराकार में प्रवेश करा सकती है
01:12तो मूर्ति पूजा उपयोगी है, बिल्कुल उपयोगी है
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