00:00आज है 20 मार्च और ये दिन हम लोगों के लिए एक खास दिन है क्योंकि आज के ही दिन
00:08बाबा साहब भीमराव अंबेटकर ने मानव अधिकारों का एक महा संग्राम सुरू किया था
00:17ये तारीक थी 20 मार्च 1927 महाराष्ट के महार में जो की राइगर जिले के अंतर गताता है वहाँ पर
00:29एक चावदार तालाब में पानी पीने का एक अंधोलन बाबा साहब ने सुरू किया था
00:39आप जानते ही है कि उस समय चुआच्छूत अपने चरम पर थी और जो अच्छूत कहे जाने वाले लोग थे
00:48उनको उस तालाब से पानी पीना मना था निसेद था
00:55कथित उच्छ जाती के लोग ही उस तालाब का पानी पी सकते थे पसू भी पी सकते थे लेकिन अच्छूतों
01:04के लिए यह एलाव नहीं था
01:07यह मानव अधिकारों का इसू था और बावा साहब ने इसे तोड़ने के लिए क्यूंकि यह एक दास्ता का प्रतिक
01:17था जाती बात का प्रतिक था अपमान का प्रतिक था
01:21इसलिए बावा साहब ने ये निर्णा लिया कि इसके खिलाप एक आंदोलन किया जाए और इसके लिए उन्होंने लोगों को
01:30एकटा किया और चावदार तालाप पर पहुँचे जैसी कि उम्मित थी कि उस समय के रूरवादी लोगों ने कथित उच
01:40जाती के लोगों ने उनका
01:42बिरोध किया लाठी डड़नों से उन पर हमला किया लेकिन बावा साहब ने अपने आंदोलन कर्मियों को समझा दिया था
01:52कि वे कानून के दाएरे में रखें सांत रहें और इस तरह वो चावदार तालाप पर पहुँचे और बिरोध के
02:02बावजू उन्होंने हातों से अंज
02:12इस परंपरा को तोड़ दिया कि सिरफ कथित उच्चे जाती के लोग ही उस तालाप का पानी पी सकते हैं
02:21उस समय बावा साहब ने कहा था कि हमारा उद्दे से सिरफ पानी पीना प्यास बुझाना नहीं है बलकि ये
02:31साबित करना है कि हम भी कथित उच्चे जातीयों की तरह �
02:36इनसान है और मैं इस बात के साथ अपनी बात खत्म करूंगा कि चुआ चात पर घात करो मानव गरिमा
02:45की बात करो
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