00:02नमस्कार, मैं डॉक्टर श्वेता तिवारी आप सभी का अभिननन करती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रिका के प्रधान
00:10संपादक विद्या वाचसपती गुलाब कोठारी जी का शरीर ही प्रमभांड श्रिंखला में पत्रिकायन में प्रकाशित �
00:18आलेख जिसका शीर्षक है अत्री बिना जन्म कहां हमारी स्रिष्टी को लोग परमेष्ठी मंडल से शुडू होती है सूर्य के
00:26आगे मह लोग है जो परमेष्ठी और सूर्य के मध्य का अंतरिक्ष है परमेष्ठी आपह लोग है इसमें भिगु अंगीरा
00:34अत्री तीन तत्�
00:37परमेष्ठी का विकास करते हैं आपह जल को कहते हैं सर्वत्र जल से ही स्रिष्टी होती है इश्वर मह लोग
00:44में ही स्रिष्टी का विजारोपन करता है मम योनिर महत ब्रह्म तस्मिन गर्भम दधाम्यहम संभवह सर्व भूतानाम ततो भवती भारत
00:54इसके लिए अत्री प्र
01:06परमेष्टी स्रिष्टी है इसी आपह रूप जीव पर सूर्य का भी प्रती प्रती प्रती पैदा होती है इसी
01:28ुप्रिष्टि को अगनी सोमात्मक कहा जाता है अगनी में सोम की आहूती से श्रिष्टि अग्य होता है अगनी का धर्म
01:40विश्कलन अर्थात खंड-खंड करना है तथा सोम का धर्म संकोच है
01:44आगने प्राण देवता कहलाते हैं तथा सोम्य प्राण असुर कहे जाते हैं वीर्या धान हेतु संकोच धर्मा आसुर प्राण अबेक्षित
01:54है आगने अवस्था से तो वीर्या विश्कलित होकर इस्थिती प्राप्त नहीं कर सकता रजस्वला इस्त्री ही वीर्य धारन करने �
02:11To be continued.
02:32प्रम ठहर जाता है कहां चला जाता है सारा रंत शिशु देह निर्माण में जीवात्मा का आवलन पारदर्शी नहीं हो
02:41सकता जब तक शरीर रहेगा जीवात्मा गर्भ में छिपा रहेगा प्रक्रति के नियम सर्वत्र लागू होते हैं समान रूट से
02:49धर्ति माता है कितना कु
03:00अत्री प्राण बिकलते होंगे अत्री प्राण शरीर से दूशित प्राणों को बाहर करता है प्रित्वी तो सूर्य की परिक्रमा करती
03:07है सूर्य पत्नी है प्रित्वी के अत्री प्राण से चंद्रमा पैदा होता है उसका शरीर तो निरंतर भर्षन से खन्वित
03:16होता जाता ह
03:45The
03:54ुप्राण की संजालक है प्रकृति श्रिष्टि तो पंच महाभूतों की समगरिता ही है शरी लक्ष्मी है आवरण है पारदर्शिता को
04:06रोखने के लिए
04:07माया का संपूर्ण कर्म ब्रहु का विवर्ट तो आकरतियों का संग्रह ही है प्रत्यक की अपनी प्रकृति एवं माकरति होती
04:16है यहां प्रित्वी तक पहुचने से पूर्व भी जीव की तीन अन्यमाता हैं होती हैं सोम गंधर्व अगनी यही तो
04:24अगनी सोम गंधर्व रू�
04:51સોરીરીત
04:52अंदकार प्रक्रति का शक्ति शाली आवरण होता है। यहीं अंदकार महद लोक में भी है जहां जीव की प्रथम उत्पत्ति
05:00है।
05:01पुरुष की प्रजनच्चमता सोम में रहती है। इस्तری की अगनी में शुक्र अन्तिम धातु है शरील का। अतअ समपून धातु
05:10का निर्मान पून हो चुका होता है। पूरुष शरील से पून शक्तिमान होता है। इस्तری शरील में रख्त के आगे
05:17के धातु कुछ कमजोर �
05:23ुप्योग ना होने की इस्थिती में रक्त के साथ बाहर निकल जाते हैं, आर्थवाक का निर्मान करती है,
05:34स्वयम लक्ष्मी के आवरण में ही रहती है, शब्द ही आवरण है द्वनी का, दतीमान प्राणमान तत्व है सरस्वति, स्वयम
05:43में अकरता है, मौन ही इसे पून रूप से आवरित रखता है, वही अत्री रूप अंधकार है द्वनी का, मंत्र
05:50में भी शब्द है द्वनी है, �
05:52जिसका प्रभाव होता है, अर्थ समझ में नहीं आता, वह बीज है, गोपनियता ही वह अंधकार है, जिसमें वपन होता
06:00है, बीज की अगनी में आहुती के साथ ही लक्षित देवता पर इसका बिंबु पड़ेगा, वही देव प्राण इसके साथ
06:07एकाकार हो जाता है,
06:09लक्षमी एवं सरस्वती दोनों प्रक्रतियां है, विद्या अविद्या रूपा, मन की कामना हैं दोनों ही, प्रत्यक कामना की दो दिशाएं
06:17होती है, मुक्ती साक्षी और स्रिष्टी साक्षी, इससे निर्मान कर्मी की दिशा तै होती है, सरस्वती प्राण रूप उर्जा ह
06:51AIU 14 VERS 14
06:53अगनेयत अत्र है, इसे पूर्वशुक्र की घंता अलप होने से अत्री प्राण पर बिंदू भाव इसमेश्ट आकरती का नहीं होगा,
07:03व्रिगू अंगीरा अत्री तीनों अगनी वारुन प्राण है, इनमें अत्री प्राण सूर्य किरण अवरोधत प्राण है, सूर्य किर्�
07:40इसी क्षोग के कारण वह अगनी कुंड तक पहुँची जाता है अंगीरा प्राण के संबंद से उसका क्षोग अल्पकाल में
07:48ही चांत हो जाता है
07:49कुछ देर अंगीरा अत्री में क्रिया प्रतिक्रिया रहती है शरीर में अत्री प्राण एविया मरुत रूप में रहता है एविया
07:57मरुत ही गर्व स्ष्टी को गमन के लिए प्रवृत्त करता है
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