00:00जब लोगों को ले गाय थे कोडियाला आरमबिक दिन थे तो शिविर लगा था यहाँ शिवपुरी के आगे कोड याला
00:06तो वहां शिवर के ठीक आगे गंगा जी का भाव था तो इसमें ये सब थे चातर लोग थे जवान लोग थे तो ये बोले गंगा में जाना है तो इनके गंगा में जाने का इंजाम किया गया उसमें एक बड़ा भारी मोटा रस्षा बांधा गया किनारे से जो भी लोग भीतर
00:36और तो पकड़ रहेंगे तो सेब्सा लंबा रचते हे अपना आगे तक दूर तक चले जा वहस रश्ते हो पकड़ा पढ़ें इसम घर तेरिख देख रहा हूं कार डरी तो देखता हूं एक ओभuição रहा है अच्छार मढद रहां है और नहीं है कि अदर ये व्हार जा रहा है
01:06और अब जाब धारा में ओते हो बह रहे तो आप पता नहीं चलता आप बह रहे हो आप अगल बगल देखो पहाड अगर हो तब तो पता भी चलेगा आप बह रहे हो वरना आप अगर आप बंद कर रहे हो ऐसी पानी को लेख तो नहीं पता चलेगा उसको पता ही नहीं चल रहा
01:36हम जिनके भरोसे हैं वो इस लायक नहीं कि उनका भरोसा किया जाए नतीजा प्रक्रती और समय की धारा हमको बहा ले जाती है और डुबो देती है गीता और अध्यात्म संबंधी सभी बुद्ध जन उस रस्य की तरह होते हैं जिसका एक सिरा तो धारा में होता है और दूसरा �
02:06सहारा के मद्धे रखते हैं वो कहते हैं जो बचना चाहे हम उसको सहारा देने को तैयार है
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