नमस्कार दोस्तों,
आज का दिन कड़कड़ाती ठंड से शुरू हुआ। चारों तरफ़ कोहरा ही कोहरा था। दोपहर के एक बजे भी ऐसा लग रहा था जैसे सुबह के पाँच बजे हों। दृश्यता इतनी कम थी कि सड़कें और इमारतें सब धुंध में गुम सी लग रही थीं।
आज हमें वाराणसी भी जाना था। करीब तीन बजे की ट्रेन थी — वंदे भारत। समय पर स्टेशन पहुँचे और राहत की बात ये रही कि ट्रेन बिल्कुल टाइम पर थी, हालाँकि कोहरा काफ़ी घना हो चुका था।
ट्रेन चली तो बाहर की दुनिया एक सफ़ेद परदे के पीछे छुपती चली गई। खिड़की से दिखती भागती पटरी, धुंध में लिपटे खेत और ठंडी हवा का अहसास… सफ़र की शुरुआत ही अपने आप में एक अनुभव बन गई।
दिल में बस एक ही ख़याल था — मंज़िल वाराणसी और रास्ते में यादों से भरा ये सफ़र।
’'धुंध के उस पार, एक शहर इंतज़ार कर रहा था… और सफ़र खुद एक कहानी बन गया।”
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