मोहन एक घुमक्कड़ ब्लॉगर था, जिसे वीरान और
रहस्यमयी जगहों के बारे में लिखना पसंद था। एक दिन उसे एक पुरानी, वीरान हवेली के बारे में पता चला, जो शहर से दूर जंगल के बीचों-बीच थी। लोग कहते थे कि वहाँ जो भी गया, कभी वापस नहीं आया। लेकिन मोहन ने इसे अफवाह मानते हुए वहाँ जाने का फैसला किया।
रात के समय, जब वह अपनी कार से उस हवेली के पास पहुँचा, तो अचानक उसकी कार की हेडलाइट्स बंद हो गईं। चारों तरफ घना अंधेरा था। हवा में एक अजीब सी गंद थी, जैसे कोई चीज़ सड़ रही हो। उसने कार से उतरकर टॉर्च जलाया और हवेली की ओर बढ़ने लगा।
हवेली के दरवाजे पर विशाल लोहे की जंजीरें थीं जैसे ही उसने उन्हें छुआ, दरवाजा खुद-ब-खुद चरमराता हुआ खुल गया। अंदर घुसते ही उसे महसूस हुआ कि कोई उसे देख रहा है। दीवारों पर लगे पुराने चित्रों के चेहरे अजीब तरह से लग रहे थे। कमरों में टूटी-फूटी कुर्सियाँ, धूल से सनी मेजें और दीमक लगी अलमारियाँ थीं।
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