00:00जब इनसान दुनिया को समझ लेता है, चेहरों के पिछे छिपे चेहरे पहचान लेता है, तब वह भीड नहीं अपना एकांत चुनता है, क्योंकि भीड बाते तो बहुत करती है, पर दिल नहीं समझती, एकांत में उसे अपने चक्खमों की आवाज भी सुनाई देती है, वो
00:30वहीं उसे शांती मिलती है, और वहीं वो खुद को फिर से पाता है, आखिर में इनसान को ऐसास होता है, कि सबसे गहरी संगत खुद की संगत होती है, राधे राधे
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