00:00अब प्रित्वी के महमान हो, मालिक नहीं, ये धर्ती हमसे पहले भी थी, हमारे बात भी रहेगी, यहां हम सब बस कुछ मोसमों के सफरिये हैं, जिनको ये धर्ती मा अपनी गोद में संभालती है,
00:20पर अफसोस महिमान होकर भी हम मेजबान जैसा वेवार नहीं कर पाई, ना कदर की छाओं की, ना सम्मान किया प्रकृती की सासों का, याद रखो, जिस मिट्टी को हम रोनते हैं, वही एक दिन हमें सुला भी देते हैं,
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