00:00आदित्य कवचम
00:01ओम अस्य श्रीमद आदित्य कवचस्तोत्र महामंत्रस्य याग्य वल्क्यो महर्शिही अनुष्टुप जगदी चंदसी
00:16ग्रिनीरिती बीजम सुर्य इतिशक्ति ही आदित्य इतिकी लकम श्री सुर्य नारायन प्रित्यर्थे जपेविन योगह
00:31उदेया चलमा गत्य वेदरूप मनामयं तुष्टाव परया भक्त्या वाले खिल्या दिभिर्वितं देवा सुरै सदावंध्यं ग्रहेष्च परिवेष्टितं ध्यायन स्तुवन पठन्नाम यसुर्य कवचम सदा
00:57ग्रिणी पातु शिरोदेशं सुर्य फालंच पातु में आदित्यो लोचने पातु शृती पातु प्रभाकरह ग्राणं पातु सदाभानु अरकह पातु मुखम तथा
01:17जिवाम पातु जगन्नाथह कंठम पातु विभावसु स्कंधव ग्रह पतिहि पातु भुजव पातु प्रभाकरह अहसकरह पातु हस्तव।
01:33रिदयम पातु भानुमान मध्यम च पातु सप्ताश्वो नाभिम पातु नभोमनिही ग्वादशात्मा कटिम पातु सविता पातु स्रिक्किनी उरु पातु सुरश्रेष्ठो जानुनी पातु भासकरह जंगे पातु चमातांडो गलं पातु त्विशंपतिही
02:01पादव ब्रद्न सदापातू, मित्रोपी सकलंब पुहू, वेद त्रयात्मक स्वामिन, नारायन जगत्पते, आयातयामंतं कांचेद, वेदरूपह प्रभाकरह, स्तोत्रेणानेन संतोष्टो, वाल्खिल्यादी भिर्रितह, साक्षाद वेदमयो देवो,
02:30रतारूढस समागतह, तंद्रिष्ट्वास सोत्थाय, दंडवत प्रणमन भुवी, पृतांजली पुटो भूत्वा, सुर्यस्याग्रेस्थितस्तदा, वेदमूर्तिर महाभागो, ज्यान द्रिष्टिर विचार्यच, ब्रह्मनास्थापितं पूर्वं, यातयाम विवर्ज
03:00शुक्लाख्यं, वेदरूपमनामयं, शब्द ब्रह्म मयं वेदं, सत्कर्म ब्रह्म वाचकं, मुनी मध्यापयामास, प्रतमं सवितास्वयं, तेन प्रतम् दत्थेन, वेदेन पर्मेश्वरह, यागवल्क्यो मुनी श्रेष्थः, खृत्-कृत्यो भवत्तदा,
03:30रिगादी सकलान बेदान ज्यातवान सुर्य सन्निधव। इदं प्रोक्तं महापुन्यं पवित्रं पापनाशनं। यह पठेच्षणुयाद्वापी सर्वपापही प्रमुच्यते। बेदार्थ ज्यान संपन्न सुर्यलोकमवापनुयाद।
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