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  • 5 months ago
History of uttarakhand

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00:00जय हिन, जय देभूम उत्तराखन, छेत्रकों हिनोवाथ, छेत्रक अत्वा स्वेथ परवत के नाम से भी, कहा गया क्योंकि यहां की कुछ से, नैसरकेक संगरस्मा अन्य देश के बनावड से अलग है, परवती भूभाग है और जया तर ठंडे एरिया है, हम ऐसा वर्ड़त है
00:30तम हो, वीवो, पंचास्त यूजनाम, खेने हो लाग है, अगर हम इसकी, लंबाई की बात कहें, लंबाई में ये पचास यूजन, और चोड़ाई में त्रिसयोजनम, बिस्ततम, बिस्तत खाया अता चोड़ाई के लिए गादवार, गंगादवार वर्तमान में पढ़ता हर
01:00परवत्षरी, नंदा दीव तक फैला हैं, और बाधार परवत्षरी कुमाओ को गरवाल से अलग करती हैं, यहाँ पर मैं यह बताना जरूरी समस्ता हूं, कि यह जो मेरा एपिसोर है, यह कुछ किताबों पर आधारित हैं, जो भी इतिहास सन्मन्दित किताब हैं, में रू�
01:30दुनियादी रूप से समयने के लिए हमें को बारवारिसम अपने काफी सारे पुराड़ों में भी इन शहरों के नाम आते हैं, जिसमें के शिव पुराड़ महाभस्थाइंडे में, विश्म के फूर्म आउतार, वो स्रिष्टी के उस्पष्टी का आधार माना यहरक्ष्य
02:00पर द्रणाचाय तपस्चा अगते द्रणाचल परवत भी हैं, द्रण, कौशिक, सत्यवर्ट, गर्ग, मारक इंडेई, तथा अन्यर जो सनत्कुमारन हैं ब्रह्मा के इस चितन में तपस्चा भी हैं, बहुत किसी भी व्यादित तुर्शन के लिए, चैनल, वेबसाइट अ
02:30कन्या उलूपी से उगा, गंगादवार छेत्र माद गंगादवार तम नागों की राजधानी हुआ करते थी, छटी सताब्ली ईशापूर उत्तरम में भारत में कास्युक से मानोंने, सात्वी सताब्ली ईशापूर ए आसवास एतिहासिक युग में प्रवेश्किया होगा,
03:00मुद्राय अन्मोरा जन्पत और कत्युए घाटी से प्राप्री है, जो की बहतमाने बिट्रिस म्यूजियम लंदन में है, कुशार सता के अधिक समय तक राज नहीं कर पाई, समुद्र गुप्त के प्रसस्ति पात्य में नेपाल के पहच्चिम में इस तक रुहेन खंड और
03:30मुगल वन्ज के समय में भी कुमाउं इसको कहा जाता है, अब गर्वाल पर आता है, गर्वाल के तरफ को गर्वाल सब्द जया, पर्मार की देने चौदी सताबने पर्मार वन्ज के एक राजा, अजय पाल ने बावन छोटे कर गड़ों के इकत्र किया, और इन गड़ों आ
04:00शाह की इस्तुति में रचित कादियरस नामें इस प्रतास है, सुयस्त तेभजी मुख भोषण धिनेग्यों गड़ी गर्वाल राजित्रा राजिसों बसाने को, अब ये लेंगज में जो थोगा अंड़स्टेंड है, तो मैं इसको समझाने पाऊंगा, इसक्रिप्ट में �
04:30एक तामर पत्र जो की संबत सत्रसों सत्तावन यानि की सत्रसों इश्मी में गी, अब तब कि जो नोट्याली ने नौसों पचास रुपन ला जाता, तीस का देर सेर, फादुकी मरा सेरों, सदामत सासों वरे, जमाउं गर्वाल संतान्य चरों, बुकेड ली हरी, छैसों पा
05:00अब ने समझा सकता हूं, मैंने भी इसका स्क्रींशॉट आपने बगल में लगा दिया, आप चाहे इसको गूगल से ट्रास्लेट का सकता अगर आप चाहें, जहांकर मैं समझता हूं कि ये किसी ने अपनी कञ्याक धन की रूप में दिया होगा राजा को ये छेत्या जूब
05:30बिद्वान ग्रिप्शं का मथ ही गरवाल तथा कुमाओं के आदि निवासिक कीराथ थे, प्राचिन गंठों में गंगा नदी, जगतमाता, दुर्गा, पारवती को भी कीराती नाम से सम्मोधित किया गया, सम्सृत में क्रूप और अपनाम कीराथ बना जो की भौगलिक, �
06:00आप दीके इसा को दुके आप यूना ने राजूत मेगस थरीजने भी किराथ जाती को बताया है, साथ इसाद महाभात के सभापरव के अध्याय चायब, बंदपरव के अध्याय नाम में भी किराथ शुद्द्द्द्द्धा, हाँ कभी बारभष्ट में कादंबरी लिकी �
06:30यहां के अधिकांस निस्टोगा, अलग-लग नाम से उनको लिया गया है, गंध माधन परवत बदूना चातिसमे राष्ते में सुबाहु मरिष्की राजधानी में रखेते, जो आज श्रेनगार क है, श्रेनगार जो हमारा गडवाल वारा स्रेनगर है, श्रेनगार के नाम से �
07:00गुरु वस्तिस्ति जीवी ने भी इसी किराध्भूनी जो हिमवाद छेत रहे हिंदाव टिहरी गरवाल में आकर एक कंद्रा में अपनी पत्नी अलुधंति के साथ कुछ वस्ति रहे थे इसके अलावा रामाय महाभाद का आतक एचिद किराध वंद पर्वके चेप्टर 36 में
07:30किराध्मना महादेव स्ववारम प्रजाध एवसाउ ब्रभूश्रम फागुमर्स सटलाश्या जिस इस्थान पर किरातों ने अपने मुख्या कहते है जिस सिर्जी के ध्वस्त ने यह दिखिया था वह विल्लव केदा के नाम से प्रसिद तीरफिस्तान बन गया है अब उत
08:00मज़त कैने जिस ने दीर दिर शमय बदलता रहा और राजशप्पा पो डाले हूती तो राजा को क्या हुते है जरत्पगी है जिनके में हठ्यार बना सकें जो उनकी सेवा का सकते है तो इसमें राजा का स्र hides
08:15बाद में कोल जाती को उन्ता ग्राम से शिवत बनना पड़ा था और बाद में धनुषवाले आखेक के लिए आते हैं शख जाती में भी यहाँ पर माइगरेट का जाते हैं जिनका मुख्य पेशा था पसुपालन असुपालन और इन लोगों में निश्वास्यों की तरह उनकी
08:45कट्यूरी भी शकों से कनेक्टेट है असा काया था कट्यूरी नरेशों के समकाली चंदेल के खुजराहों के शुला में भी खश मरेश की ताकत को अजवाया था अब कुमाओं के ब्रामः और राजपूद में भी समय बीट में था उन्जीश का जो एरिया था वो दिन पर �
09:15अपने अपनी जी गेतों महाम थे आज ही महाम है हर किसी का अपने स्किल्ड होता है जहां पर दामः समुदाए पूजापाथ अपने धार्मिक का अनुस्थान करता है और राजपूद देश की सुरक्षा करता है इस पहला राजा गरुन ग्यामचन था जो कि सबसे पहने द
09:45की बुख अलगती है और आज की बुख अलग है फ्राग जो भी है सुल्तान से ग्यामचन के द्वारा बहुमुली चीजे देता है जिसे बहुमुली चीजे प्रसन नोके से गरुड की उपाधि दी इसके साथ ही कुमाओं का तराई प्रांत भी उसको सौब दिया गया परं�
10:15नहां कुमाओं के राजा मरिक चंद ने उसके निवाह के लिए कुछ गाव उसको दी थे ताजा खाको कुमाओं में रफ खाका को पकड़ने ले भीजा समकाली मुगल दरवार अकबर और जहागीर थे लक्षमी चंद गर्मेरिष के राजे में तो बार-बार आक्रमर तरता
10:45अपने स्वजाती राजाओं की बिर्द भी उनकी दिग्विजे हुती थी और एक्टरिक हजूरी कायमर की वाकियाते जहांगीरी का लेख में बताता है कि रूप चंद की तरह ही लक्षमी चंद भी मुगल दरवार में अपनी दर्जी की थी यहाँ पर वो अनेक बहुमुल
11:15के बाज हो गए शिकारे, तलवार, खुखरिया समय अनेक सारी एज गिफ्ट के रुप में बादश्या सलामत को भैट करता था अब इस सम्मन में डॉक्टर श्यामलाल का तरक है कि वाज वहादो संद के समय कुमाओं की तरही छित में मुगल वादशा शेह पाका कटेहरिया
11:45गोडे, खुखरी, सोने चादी के बतन बादशा सलामत की खित्मत में लेगया, यही से गड़ राजी के बिद्व बादशा का साथ भी दिया, बदल में उसे बादशा ने कुमाओं का जमीरा घूशित क्या दिया गया, और मुरादाबाद का सुवेरा, रुस्तम खाव नव
12:15तेरेशत के मद्व, वाज भादुर ने भी उनकी मित्ता सुवेरा, यही कहना चीज इसको इसके लिए सब्दा आता है, भात्र घाता कि उद्ध में दाराशिकों वा सुलेमान के शिकों को भी कुमाओं में भाद कर सरण के लिए आना पड़ा, क्योंकि इस समय जी थी, पहा
12:45अर अरंग जेब को सौप दिया, और बाद में धोगे से अरंग जेब नसको दिल्दी बिलाता है, इस तरह से मुगल वाद्शा को मरवा दिया गया था, वादुर साह जिफर के बाद, वाज वादुर के बाद, जगर्चन वे भी मुगल वाद्शा वादुर शाह के समय में �
13:15कुमाओं में चंद्रोंशी राजाओं के संबंदों का पता भी शिक्कों से चलता है, कुमाओं में आज भी पुराने मंद्र में ताबे शिक्के मिलते हैं, उतकरिष्ट लिपी पर्श्यन है, जो कि खरोष्टी लिपी की भाति दाय से बाई तक को पड़ी जाती है, डॉक्
13:45के द्वारा प्रिचलिक, जीतल और मगल वाजशाओं के द्वारा मुहरे भी यहाँ, प्रिचार में रहेंगे, अवद के नवाब मंसूर अली खा के शिक्के यहां रुहिले द्वारा लाए गे थे, मुहमत बिन तुगलक के समय में तामर शिक्के मिल जाते हैं, इसमें अग
14:1532 में, गंगोली हाट के कालिका मंदिर एपास, देवदार के ब्रक्षों के जुनमत के नीचे, एक व्यक्ति और जमिन के अंदर, ताबे में, 300 ताबे के सिक्के मिले थे, जिला प्रिचासने लखनों म्यूजियम में रखने के लिए भेज दिया, सिक्के सभी एक दूसे नही
14:45रोहिलों द्वारा लाई गए, इनी मंसूरी सिक्कों के पिचलने में आने और उसकी लूट पाट से बचने के रिख दिश से, जो जिसने भी इनको कोलेक्ट गया, सुरक्षाय दिश्ति से गढढ़ा कोट के इनको सुरक्षित रख दिया गया, या जमीन में छिपा दिया ग
15:15लेख मिलता है, निश्चे ही मुगलों के साथ चंदों के संबंदों के प्रटीक है, और मुगल कालीन सिक्कों जे चंदराजा उसी के आपसी जैसे वो लोग गिफ्ट देने जाते थे तो उनके बदन को सिक्के मिलते थे, और इमावर्ती गाउ में तिब्वती सिक्के भी प
15:45बद्रिनात मंद्र में चड़ाने के लिए उद्दिर से लाएगी कि बद्रिनात और केदानात के समान महान और सरवच्चे धामों में मुस्लिम सांख्षकों के नामों वाले शिक्के भी चड़ाना उच्चित प्रतीत नहीं रहा होगा, यहीं इस्तिति अंज दूर आजाओ
16:15संकाल की काफी दिमार की उपादी राजवार थी तो चंदो के राजकुमार अपने नाम के पूर में महाराज, कुमार, कुर या गुशाई लगाते थे, महाराजकुमार नाम के पहले लगता था जबकि कुर और गुशाई नाम के अंत्य में इस्तेमाल में होते थे, इसमें म
16:45जाक बड़ोई शीरी राजा धिराज महाराजा सिरी ग्यान चंद्र शीरी ग्यान जिगत्चन शीरी राजा गयान चंद्र देव जीव शीरी महाधिराज सिरी राजा लच्छिमन चंद्र देव महाधिराज सिरी राजा बाज बहादुर चंद्र देव महाधिराज सिरी राजा
17:15तो वीडियो अभी और भी है, अभी मैं आथवा मोबाइल हैंक करा क्योंकि इसका स्टोरेज हो चुका खतम, तो बाकी टॉपिक्स को मैं अगले एप्टिसोड में कवर करेंगा, आप वीडियो में बने रहें, और ये दोनों मेरे ही प्रॉडक्ट है, एक मेरा व्लॉप चैनल
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